करोड़ों रुपये खर्च , फिर भी चम्पावत में नहीं हो रहा विकास
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
खानापूर्ति करने वाले अधिकारियों के चलते सीमावर्ती गांव में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद भी नहीं हो पाया विकास ।
चम्पावत ( Champawat ) - भारत - नेपाल सीमा का विभाजन करने वाली महाकाली नदी से लगे सीमावर्ती गांवो में जिला प्रशासन द्वारा गठित अलग-अलग टीमों ने लोगों की आय बढ़ाने के लिए जिन कार्यक्रमों को अपनाने की संस्तुति की गई है , उसमें मौन पालन जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की सरासर अनदेखी की गई है । दरअसल मौन पालन ऐसा कार्यक्रम है जिसमें बागवानी व मौन पालन की जुगलबंदी से ग्रामीणों को रोजगार एवं अतिरिक्त आय संवर्धन का जरिया बनाया जा सकता है । चंपावत जिले में मौन बॉक्सो के माइग्रेशन की परंपरा नहीं है , लेकिन वक्त के साथ शहद की दो फसलें लेने के लिए ग्रीष्म ऋतु में बक्सों को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एवं शीतकाल में घाटी वाले क्षेत्रों में रखा जाना चाहिए । इससे फल व सब्जियों के उत्पादन में 30 से 35 फ़ीसदी इजाफा आने के साथ उत्पादों की गुणवत्ता में भी निखार आएगा । शीतकाल में जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सभी वनस्पतियां सूख जाती हैं , तब घाटी क्षेत्र में सरसों व च्यूरा फूलने लगता है । इस कार्यक्रम को जिले में कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं , लेकिन कैसे ? क्योंकि मौन पालन कार्यक्रम को शुरू करने के लिए जिले में ढंग का एक भी विशेषज्ञ नहीं है । यदि सही मायनों में इसे संचालित किया जाए तो यह मॉडल जिले को नई पहचान दे सकता है । मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस कार्यक्रम को शुरू करने के लिए पहले ही जोर दे चुके हैं , लेकिन अधिकारियों को लापरवाही छोड़नी होगी ।चंपावत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है मौन पालन - हरीश तिवारी
मौन पालन विशेषज्ञ एवं जिले में डीएचओ के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हरीश तिवारी का कहना है कि , जिले के सभी स्थानों में मौन पालन कार्यक्रम के फलीभूत होने की व्यापक संभावनाएं हैं । नेपाल के सीमावर्ती गांव में तो इसके उत्पादन की और अधिक अपार संभावनाएं हैं ।सीडीओ डॉ जीएस खाती के दावे हवा - हवाई
खाती कहते हैं , वाइब्रेंट गांव के विकास व रोजगार में मौन पालन कार्यक्रम को प्रमुखता से संचालित किया जाएगा । घाटी क्षेत्रों में पहाड़ का कल्पवृक्ष कहे जाने वाले च्यूरा के पौधों का व्यापक स्तर पर रोपण भी किया जाएगा । लेकिन उनके दावे भी हवा - हवाई लगते हैं , क्योंकि अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नजर नहीं आता है ।खानापूर्ति करने वाले अधिकारियों के चलते सीमावर्ती गांव में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद भी नहीं हो पाया विकास -
चम्पावत जिले में भारत - नेपाल सीमा पर स्थित सीमावर्ती गांवों में विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं , लेकिन इसके बावजूद भी इन गांवों का विकास नहीं हो पा रहा है । जिला प्रशासन द्वारा गठित टीमों ने ग्रामीणों की आय बढ़ाने के लिए कई कार्यक्रमों की संस्तुति की है , लेकिन इनमें से अधिकांश कार्यक्रम खानापूर्ति तक ही सीमित हैं ।मौन पालन कार्यक्रम की घोर उपेक्षा -
मौन पालन एक ऐसा कार्यक्रम है जो ग्रामीणों को रोजगार और अतिरिक्त आय प्रदान कर सकता है । इस कार्यक्रम को जिले में कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं । लेकिन हैरानी की बात है कि , जिले में मौन पालन कार्यक्रम को शुरू करने के लिए एक भी विशेषज्ञ नहीं है । यह अधिकारियों की लापरवाही का ही परिणाम है कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को नजरअंदाज किया जा रहा है ।अधिकारियों को छोड़नी होगी लापरवाही -
चम्पावत जिले में विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं , लेकिन इसके बावजूद भी जिले का विकास नहीं हो पा रहा है । मौन पालन कार्यक्रम को शुरू करने से जिले की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है , लेकिन इसके लिए अधिकारियों को अपनी लापरवाही छोड़नी होगी और ठोस कदम उठाने होंगे । जिला प्रशासन को चाहिए कि वह इस कार्यक्रम को प्रमुखता से संचालित करे और जिले के विकास के लिए काम करे । अगर हालात ऐसे ही रहे , तो ये मुख्यमंत्री के मॉडल जिले की परिकल्पना पर बट्टा साबित होगा और मुख्यमंत्री की मॉडल जिले की सोच के साथ एक बहुत बड़ा विश्वासघात होगा ।
फ़ोटो : अपने मौनपालन उद्यम को दिखाता खेतीखान का युवा , रिंकू ।
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