मिशाल : पहाड़ की माटी से युवक ने उगाया सोना
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
बनीगांव के युवक ने छोड़ी नौकरी की दौड़ , पहाड़ी जमीन को बनाया रोज़गार का मजबूत जरिया ।
चम्पावत ( Champawat ) - जहां एक ओर पहाड़ों के युवा खेत-खलिहान छोड़कर रोजगार की तलाश में मैदानी क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं , वहीं लोहाघाट के समीप बनीगांव निवासी विनोद बोहरा ने मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है । उन्होंने खेती को बोझ नहीं , बल्कि सम्मानजनक आजीविका का साधन बनाकर यह दिखा दिया कि सही सोच और मेहनत से पहाड़ की मिट्टी भी सोना उगल सकती है ।बेमौसमी सब्जियों की स्मार्ट खेती , बाजार में है मांग -
विनोद बोहरा जैविक और बेमौसमी खेती के माध्यम से न केवल बैगन , गोभी , ब्रोकली , शिमलामिर्च , आलू , मक्का , कद्दू , ककड़ी और बेल वाली राजमा जैसी फसलें उगा रहे हैं , बल्कि बाजार में इन्हें उनके नाम से पहचाना जाने लगा है । एक सीजन में ही वह अकेले ककड़ी से एक लाख रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं । वे ऐसी फसलें लगाते हैं जब बाजार में उनकी कीमत सर्वोच्च स्तर पर होती है ।संघर्ष में भी नहीं टूटा हौसला , सिंचाई के लिए ढोते हैं पानी -
उनके पास सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है , बावजूद इसके वह 200 मीटर दूर खड़ी चढ़ाई से पानी लाकर पौधों को सींचते हैं । यदि उन्हें सिंचाई की समुचित सुविधा मिल जाए , तो वे उत्पादन को दुगुना करने का दम रखते हैं ।पारिवारिक सहयोग और बहुमुखी प्रतिभा से संवर रही खेती -
विनोद की इस मेहनत में उनकी पत्नी निर्मला और पिता अमर सिंह कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रहे हैं । उन्होंने हाल ही में कीवी उत्पादन का भी ट्रायल शुरू किया है । साथ ही वे दो गायों को भी पालते हैं , जिससे प्राकृतिक खाद मिलती है और उत्पादन की गुणवत्ता में इज़ाफा होता है । विनोद दिन में लोहाघाट के एक मिठाई की दुकान में कारीगर के रूप में काम भी करते हैं । उनकी मिठाइयों का स्वाद उतना ही लोकप्रिय है जितनी उनकी सब्जियों की खुशबू ।खेती में नवाचार की जरूरत -
विनोद का कहना है कि अब वर्टिकल फार्मिंग को पहाड़ों में बढ़ावा देना जरूरी है , ताकि बेल वाली सब्जियों की खेती के लिए हरे पेड़ों का नुकसान न हो । यदि उन्हें तार की जालियां , लोहे के स्टैग और सोलर फेंसिंग की सुविधा मिल जाए , तो न केवल जंगली जानवरों से फसलों की रक्षा होगी बल्कि उत्पादन भी कई गुना बढ़ेगा ।माटी से जुड़ें और मिसाल बनें -
आज जरूरत है ऐसे ही पुरुषार्थी युवाओं की जो खेती को कर्मभूमि बनाएं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ खुद भी आगे बढ़ें । सरकार और स्थानीय निकायों को भी ऐसे लोगों को तकनीकी सहायता और संसाधनों से समर्थन देना चाहिए ।
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