खून से खत : उत्तराखंड के शिक्षक नाराज़ , सीएम - पीएम को भेजी लहू में भीगी चिट्ठियाँ
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
देहरादून ( Dehradun ) - उत्तराखंड में शिक्षकों का गुस्सा अब स्याही से नहीं , खून से खत लिखकर सामने आ रहा है । अपनी मांगों को लेकर आवाज़ उठा रहे शिक्षकों ने अब मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को खून से लिखे पत्र भेज डाले हैं । यह चौंकाने वाला कदम जहां एक ओर सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल खड़ा करता है , वहीं समाज को हिला देने वाला संदेश भी देता है । चम्पावत जिले के राइंका दुबचौड़ा के सहायक अध्यापक विनोद प्रकाश गहतोड़ी ने भी प्रधानमंत्री को खून से लिखा पत्र भेजा है ।जब स्याही बेअसर हुई तो खून उतरा कागज़ पर
प्रधानाचार्य सीधी भर्ती निरस्त करने और शिक्षकों की पदोन्नति जैसी मांगों को लेकर लंबे समय से आंदोलनरत शिक्षकों का कहना है कि बार - बार धरना और ज्ञापन देने के बाद भी सरकार उनकी नहीं सुन रही । मजबूर होकर अब उन्होंने अपने लहू से खत लिखकर सत्ता तक अपनी पुकार पहुँचाई है ।लोकतंत्र पर उठे सवाल , खून से क्यों लिखने पड़े खत ?
लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ा हथियार होता है । लेकिन जब हालात इस कदर बिगड़ें कि शिक्षकों को अपनी पीड़ा खून से लिखनी पड़े , तो यह शासन - प्रशासन की नाकामी को दर्शाता है । सवाल यह है - क्या समाज की रीढ़ माने जाने वाले शिक्षकों की आवाज़ को इतना कमजोर कर दिया गया है कि उसे अनसुना किया जा रहा है ?समाज को झकझोरने वाली तस्वीर
खून से लिखे खत सिर्फ़ एक प्रतीक नहीं , बल्कि गहरी पीड़ा और नाराज़गी का संकेत हैं । यह घटना युवाओं और आम जनता को भी झकझोर रही है । खून से लिखे खत सिर्फ़ एक प्रतीक नहीं , बल्कि गहरी पीड़ा और नाराज़गी का प्रतीक हैं । यह संदेश युवाओं और आम जनता को भी विचलित करता है कि अगर अपनी आवाज़ सुनवानी है , तो स्याही नहीं, खून बहाना पड़ेगा ।सरकार के लिए चेतावनी की घंटी
शिक्षकों की मांगें कोई नई नहीं हैं । लगातार आंदोलनों , बार - बार दिए गए आश्वासनों और फिर निराशाओं के बाद अब यह स्थिति बनी है । सवाल यह है कि सरकार कब जागेगी और शिक्षकों की समस्याओं का स्थायी हल कब निकलेगा ?
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