पूर्व विधायक का निधन : आर - पार की लड़ाई का ऐलान करने वाले योद्धा के निधन पर उत्तराखंड में शोक
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट नहीं रहे : बीएचईएल की नौकरी छोड़ उत्तराखंड को दिलाया अलग राज्य , जिंदगी के आख़िरी दिनों में भी लड़ते रहे पहाड़ की लड़ाई ।
देहरादून ( Dehradun ) - टिहरी गढ़वाल के ग्राम सुपार , पट्टी बड़ियारगढ़ के भोला दत्त भट्ट के घर 4 दिसंबर 1944 को जन्मे दिवाकर भट्ट कभी साधारण परिवार के बेटे थे , लेकिन आगे चलकर उन्हें उत्तराखंड आंदोलन का फील्ड मार्शल कहा जाने लगा । बीएचईएल में फीटर की पक्की नौकरी छोड़ उन्होंने अपना सब कुछ अलग उत्तराखंड राज्य की लड़ाई के नाम कर दिया । आखिरकार केंद्र सरकार को भी पहाड़ की पुकार सुननी पड़ी और उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ , तो उसके अहम सूत्रधारों में दिवाकर भट्ट का नाम सबसे आगे दर्ज हो गया ।देहरादून से कनखल तक की पढ़ाई , श्रीनगर से आईटीआई , फिर नौकरी छोड़ आंदोलन का रास्ता
दिवाकर भट्ट की प्राथमिक से हाईस्कूल तक की शिक्षा देहरादून में हुई , जबकि 12वीं की कक्षा उन्होंने हरिद्वार के कनखल से पूरी की । साल 1967 में उन्होंने श्रीनगर गढ़वाल से आईटीआई किया और 1969 तक आईडीपीएल में सेवा दी । इसके बाद वे हरिद्वार के बीएचईएल में नौकरी पर आ गए । नौकरी के साथ-साथ ही उन्होंने सामाजिक संगठन तरुण हिमालय की नींव रखी और यहीं से उनका झुकाव पूरी तरह जनआंदोलनों की ओर हो गया । नौकरी छोड़कर उन्होंने पहाड़ और पहाड़ के लोगों के हक के लिए जीवन दांव पर लगा दिया ।गढ़वाल विवि आंदोलन से लेकर वन संरक्षण अधिनियम के विरोध तक रहे अगली कतार में
साल 1971 में गढ़वाल विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए चले आंदोलन में दिवाकर भट्ट ने जोरदार संघर्ष किया । इसके बाद 1980 के वन संरक्षण अधिनियम के विरोध में हुए आंदोलनों में भी उनकी अग्रणी भूमिका रही । 1982 में वे कीर्तिनगर के ब्लॉक प्रमुख चुने गए , लेकिन सत्ता की कुर्सी से ज्यादा उन्हें सड़क पर संघर्ष की राजनीति रास आती रही । गांव - गांव , ब्लॉक - ब्लॉक घूमकर वे पहाड़ के नौजवानों को संगठित करते रहे ।पौड़ी अगस्त क्रांति : आर - पार की लड़ाई का ऐलान , लाठीचार्ज भी झेला
1994 में पौड़ी में हुए जेल भरो आंदोलन की कमान दिवाकर भट्ट ने संभाली । 2 अगस्त 1994 को पौड़ी अगस्त क्रांति के दौरान उन्होंने खुले मंच से उत्तराखंड के लिए आर - पार की लड़ाई का एलान कर दिया । पौड़ी में दमन के खिलाफ संसद कूच का नेतृत्व भी दिवाकर भट्ट ने ही किया । इस दौरान पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया , लेकिन वे पीछे नहीं हटे । यही दौर था , जब वे पहाड़ के युवाओं के बीच प्रतिरोध की मज़बूत आवाज बनकर उभरे ।फील्ड मार्शल की उपाधि दी , पहाड़ के गांधी इंद्रमणि बडोनी ने
24 जुलाई 1993 को श्रीनगर के डालमिया धर्मशाला में आयोजित एक अधिवेशन में दिवाकर भट्ट को फील्ड मार्शल की ऐतिहासिक उपाधि दी गई । उन्हें यह नाम यूकेडी संरक्षक , पहाड़ के गांधी के नाम से प्रसिद्ध इंद्रमणि बडोनी ने दिया । यही वह पल था , जब दिवाकर भट्ट केवल एक नेता नहीं रहे , बल्कि उत्तराखंड आंदोलन के रणनीतिक सेनापति के रूप में पहचाने जाने लगे ।यूकेडी से दो बार केंद्रीय अध्यक्ष , पहला चुनाव हारे तो पत्नी कोमा में चली गई
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद दिवाकर भट्ट ने यूकेडी के टिकट पर 2002 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा , लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा । इस सदमे के कुछ ही समय बाद उनकी पत्नी कोमा में चली गईं , जिससे उनका निजी जीवन गहरे संकट में डूब गया । इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 2007 में देवप्रयाग से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे । वे वर्ष 1999 और 2017 में दो बार उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष भी रहे ।आंदोलनकारियों के मुकदमे वापसी की लड़ाई , कोर्ट में सरेंडर , 14 दिन की न्यायिक हिरासत
वर्ष 2002 में आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग को लेकर टिहरी में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ । इसी कड़ी में 10 दिसंबर को दिवाकर भट्ट ने अदालत में सरेंडर किया । उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया । जेल में रहते हुए उन्होंने रोज़ाना सिर्फ एक वक्त भोजन करने का संकल्प लिया । यह उनके त्याग , अनुशासन और आंदोलन के प्रति समर्पण का सशक्त प्रतीक बन गया ।भाजपा के टिकट पर भी लड़ी चुनावी लड़ाई , लेकिन पहाड़ के मुद्दे नहीं छोड़े
साल 2012 में दिवाकर भट्ट भाजपा के टिकट पर देवप्रयाग से चुनाव मैदान में उतरे , लेकिन मंत्री प्रसाद नैथानी से हार गए । चुनावी हार और बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी धीरे - धीरे खराब होता गया । इसके बावजूद उन्होंने उत्तराखंड के मूलभूत मुद्दों - पलायन , रोजगार , शिक्षा , स्वास्थ्य , पहाड़ की असमान विकास नीतियों पर आवाज उठाना नहीं छोड़ा । चाहे मंच हो , बैठक हो या मीडिया , दिवाकर भट्ट हर जगह पहाड़ के पक्ष की बेबाक पैरवी करते रहे ।आखिरी दिनों में गंभीर शारीरिक समस्याएं , 25 नवम्बर को ली अंतिम सांस
जीवन के आखिरी दिनों में दिवाकर भट्ट गंभीर शारीरिक समस्याओं से जूझते रहे । उन्हें करीब 10 दिन तक देहरादून के एक निजी अस्पताल में भर्ती रखा गया , लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ । आखिरकार 25 नवम्बर को उन्होंने अंतिम सांस ली । उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने एक ऐसा जुझारू आंदोलनकारी खो दिया , जिसने सरकारी नौकरी , सुविधाएं और निजी सुख - चैन छोड़कर पूरी जिंदगी पहाड़ की लड़ाई में झोंक दी । उत्तराखंड राज्य गठन सहित तमाम बड़े आंदोलनों में उनकी भूमिका को हमेशा याद रखा जाएगा । फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट अब इस दुनिया में नहीं हैं , लेकिन संघर्ष , जुनून और त्याग से भरी उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी ।
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