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दुःखद : जिला अस्पताल में ईलाज के दौरान संदिग्ध मौत , उठे कई सवाल - Uttarakhand Hindi Samachar

Posted by admin
Posted Date: 2025-12-01 16:57:21
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दुःखद : जिला अस्पताल में ईलाज के दौरान संदिग्ध मौत , उठे कई सवाल


(Report - uttarakhandhindisamachar.com)

बागेश्वर ( Bageshwar ) - जिला अस्पताल में इलाज के दौरान एक 32 वर्षीय गर्भवती महिला की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । पिथौरागढ़ जिले के थल क्षेत्र की रहने वाली गर्भवती कविता पाठक पत्नी नरेश पाठक की रविवार सुबह उपचार के दौरान मौत हो गई । परिजनों का आरोप है कि इलाज में लापरवाही बरती गई , समय पर ब्लड नहीं चढ़ाया गया और दवाओं से उसकी हालत और बिगड़ती चली गई । घटना के बाद जिला अस्पताल परिसर में हंगामा खड़ा हो गया , जिसके बाद पुलिस को मौके पर बुलाना पड़ा ।

बेरीनाग से रेफर होकर पहुंची , बागेश्वर में टूटी सांस

मिली जानकारी के मुताबिक पिथौरागढ़ जिले के संगोड़ कोटमन्या , थल निवासी 32 वर्षीय कविता पाठक को शनिवार देर शाम अचानक तबीयत बिगड़ने पर स्वजन बेरीनाग अस्पताल लेकर पहुंचे थे । बेरीनाग अस्पताल में प्राथमिक जांच के बाद उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल जिला अस्पताल बागेश्वर रेफर कर दिया गया । देर रात बागेश्वर पहुंचने के बाद उसे तुरंत भर्ती कर उपचार शुरू किया गया । परिवार के अनुसार रातभर वह अस्पताल में भर्ती रही , लेकिन रविवार सुबह उसकी हालत अचानक बिगड़ने लगी और कुछ ही समय बाद उसने उपचार के दौरान दम तोड़ दिया । मौत की खबर फैलते ही परिजनों में कोहराम मच गया और अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए लोगों ने नाराजगी भी जताई ।

मां का आरोप : खून लेकर आए थे , फिर भी नहीं चढ़ाया , दवाइयों से बिगड़ी हालत

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मृतका की मां द्रोपती देवी ने जिला अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं । उनका कहना है कि बेटी के शरीर में खून की कमी थी और डॉक्टरों ने ब्लड चढ़ाने की बात कही थी । इसके बाद परिजन खुद खून की व्यवस्था करके अस्पताल पहुंचे , लेकिन आरोप है कि लंबे समय तक ब्लड चढ़ाया ही नहीं गया । द्रोपती देवी के अनुसार डॉक्टरों ने पहले कविता को कुछ दवाइयां खाने को दीं , दवाई लेने के बाद वह थोड़ी सहज दिखी , यहां तक कि उसने खाना भी खाया , लेकिन कुछ ही देर बाद उसकी हालत अचानक बिगड़ने लगी और उसे तेज दर्द शुरू हो गया । इसी बीच अस्पताल कर्मियों ने अपनी मर्जी से ब्लड चढ़ाना शुरू किया , लेकिन तब तक देर हो चुकी थी । परिजनों का यह भी आरोप है कि इलाज के नाम पर उनसे चार हजार रुपये की मांग की गई , हालांकि बाद में यह राशि लौटा दी गई । द्रोपती देवी का कहना है कि यह पूरी घटना अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है और इनकी गलती ने उनकी बेटी की जान ले ली ।

डॉक्टर का पक्ष : गर्भपात की दवा से बढ़ा जोखिम , अत्यधिक रक्तस्राव से बिगड़ी स्थिति

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वहीं , मामले में महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. रीमा उपाध्याय ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि गर्भवती महिला बेरीनाग से रेफर होकर जिला अस्पताल बागेश्वर आई थी । उन्होंने कहा कि गर्भ रुकने पर कविता ने गर्भपात की दवा का सेवन कर लिया था , जिसके कारण उसे अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था । डॉक्टर ने बताया कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसे बचाने के लिए लगातार प्रयास किए गए , लेकिन रक्तस्राव इतना अधिक था कि उसकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया । चिकित्सीय पक्ष के अनुसार यह एक हाई रिस्क केस था , जहां दवा के सेवन , देर से पहुंचने और अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी परिस्थितियां घातक साबित हुईं , हालांकि परिजन इस व्याख्या से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं ।

दो मासूम बच्चों से छीनी मां , गांव में मातम और गुस्सा

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कविता पाठक की मौत ने उसके परिवार के साथ पूरे गांव को शोक में डूबो दिया है । मृतका के दो छोटे बच्चे हैं , जिनके सिर से अचानक मां का साया उठ गया । घर का माहौल गमगीन है , पति और परिजन बदहवास हैं और लगातार यही सवाल पूछ रहे हैं कि अगर समय पर सही इलाज हुआ होता तो क्या कविता की जान बचाई जा सकती थी । गांव संगोड़ कोटमन्या और आस-पास के इलाके में भी इस घटना को लेकर भारी दुख और आक्रोश है । लोग कह रहे हैं कि हर बार किसी गरीब की जान जाने के बाद ही सिस्टम जागता है और कुछ दिन बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है ।

अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल , पुलिस जांच में जुटी

घटना के बाद जिला अस्पताल प्रशासन ने कोतवाली पुलिस को सूचना दी । सूचना पर पुलिस टीम अस्पताल पहुंची और पंचनामा भरने के बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू कर दी है । पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी । इधर , परिजन और स्थानीय लोग अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं कि जब खून की कमी स्पष्ट थी और परिजन ब्लड की व्यवस्था करके भी पहुंचे थे , तो समय रहते ब्लड ट्रांसफ्यूजन क्यों नहीं किया गया , इमरजेंसी प्रोटोकॉल कितनी तत्परता से फॉलो किया गया और इलाज के बीच पैसों की मांग क्यों हुई । यही सवाल अब सिस्टम की जवाबदेही पर सीधा चोट कर रहे हैं ।

सिस्टम की नाकामी या महज दुर्भाग्य ? जवाबदेही तय होना जरूरी

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एक तरफ डॉक्टर गर्भपात की दवा और अत्यधिक रक्तस्राव को कविता की मौत की बड़ी वजह बता रहे हैं , तो दूसरी तरफ परिजन इलाज में देरी , दवाओं के असर , ब्लड न चढ़ाने और पैसों के लेन-देन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । इस बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समय पर , मानक प्रोटोकॉल के मुताबिक और बिना लापरवाही के इलाज होता तो क्या 32 साल की यह गर्भवती महिला बच सकती थी । यह दुखद घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं , बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगा वह काला धब्बा है , जो बार-बार खुद को दोहराता है । जांच , बयान और कागजी कार्रवाई के बीच अगर वास्तविक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई तो ऐसी मौतें आने वाले दिनों में भी महज आंकड़ों में बदलकर रह जाएंगी । फिलहाल गांव में मातम है , परिवार टूट चुका है और सिस्टम से जवाब की उम्मीद में सबकी निगाहें टिकी हुई हैं ।

फ़ोटो - प्रतीकात्मक ।







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