वीडियो : 90s का सुपरहिट फिर ट्रेंड में , ए जा ओ मेरी चनुली ने मचाई सोशल मीडिया पर धूम
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
विशेष रिपोर्ट - उत्तराखंड हिंदी समाचार
उत्तराखंड - की वादियों में गूंजने वाला 90 के दशक का वो सदाबहार गीत - ए जा ओ मेरी चनुली माठू माठू ए जा ... आज एक बार फिर चर्चाओं में है । जिस गीत ने कभी कैसेट और रेडियो के दौर में धूम मचाई थी , वही अब सोशल मीडिया पर नए अंदाज में वायरल हो रहा है ।वीडियो का लिंक खबर के अंत में दिया गया है । इस गीत को आवाज दी थी , उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नैननाथ रावल जी ने । 1990 के दशक में रिलीज हुआ यह गीत आज भी लोगों की जुबां पर चढ़ा हुआ है । वीडियो का लिंक खबर के अंत में दिया गया है ।कैसेट से लेकर इंस्टाग्राम , फेसबुक और यूट्यूब रील्स तक का सफर
एक समय था जब गांव - गांव में टेप रिकॉर्डर पर यह गीत बजता था । शादी - ब्याह हो या मेलों की रौनक , चनुली के बिना माहौल अधूरा लगता था । समय बदला , तकनीक बदली , लेकिन गीत का जादू नहीं टूटा । आज यही गाना फेसबुक , इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर नए रीमिक्स और वीडियो के साथ ट्रेंड कर रहा है । युवा पीढ़ी भी इस गीत पर रील्स बनाकर अपनी संस्कृति से जुड़ रही है । वीडियो का लिंक खबर के अंत में दिया गया है ।जानिए , कौन हैं नैननाथ रावल ?
नैननाथ रावल सिर्फ एक गायक नहीं , बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की पहचान हैं । 90 के दशक में उन्होंने कई ऐसे गीत गाए जो आज भी सदाबहार हैं । उनकी आवाज में पहाड़ की मिठास , दर्द और प्रेम की झलक साफ सुनाई देती है । ए जा ओ मेरी चनुली उनके करियर का ऐसा गीत बना जिसने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई ।आखिर क्यों फिर सुर्खियों में आया ये गीत ?
इस गीत के सुर्खियों में आने की वजह सोशल मीडिया पर पुराने पहाड़ी गीतों का ट्रेंड , युवाओं द्वारा रीमिक्स और डांस वीडियो , उत्तराखंडी संस्कृति के प्रति बढ़ते लगाव को माना जा रहा है । कह सकते हैं कि यह गीत अब सिर्फ 90s की याद नहीं , बल्कि आज की डिजिटल पीढ़ी का भी पसंदीदा बन चुका है । उत्तराखंड का लोकसंगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं , बल्कि संस्कृति और परंपरा का आईना है । चनुली जैसे गीत बताते हैं कि सच्चा संगीत कभी पुराना नहीं होता । आज जब पहाड़ से पलायन और बदलती जीवनशैली की चर्चा होती है , ऐसे गीत लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहे हैं । ए जा ओ मेरी चनुली माठू माठू ए जा सिर्फ एक गीत नहीं , बल्कि उत्तराखंड की भावनाओं की धड़कन है । 1990 के दशक में शुरू हुआ इसका सफर आज सोशल मीडिया के दौर में भी जारी है । पुराने गीतों का यह पुनर्जागरण साफ संकेत है कि पहाड़ की आवाज कभी दबती नहीं , बस समय के साथ और मजबूत होती जाती है ।वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर टच करें
इस लिंक पर टच करें - https://youtu.be/TtN1lMTFxog?si=cn_GuR7Bc9nKwsAH
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