इंसानियत हुई शर्मसार : जिंदा नहीं तो कंकाल ही सही ? बैंक सिस्टम की बेशर्मी पर उठा सबसे बड़ा सवाल
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
ओडिशा - के क्योंझर जिले से सामने आई यह घटना सिर्फ खबर नहीं , बल्कि व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है । एक आदिवासी युवक जीतू मुंडा , अपनी मरी हुई बहन का कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक पहुंच गया । वजह ? बैंक कर्मचारियों को खाता धारक चाहिए था ।कागजों में उलझे कर्मचारी , इंसानियत गए भूल
जीतू अपनी बहन कालरा मुंडा के खाते से महज 20 हजार रुपये निकालना चाहता था । बार-बार बैंक के चक्कर काटे , गिड़गिड़ाया , बताया कि बहन अब इस दुनिया में नहीं रही , लेकिन बैंक कर्मियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी । नियमों की आड़ में संवेदनाएं दफन कर दी गईं और एक गरीब , अनपढ़ आदमी को बस खाता धारक को लाओ का रटा-रटाया जवाब मिलता रहा ।मजबूरी इतनी कि कब्र से निकाल लाया कंकाल
जब सिस्टम ने इंसान को समझना बंद कर दिया , तो जीतू ने सिस्टम को झकझोरने का फैसला किया । वह अपनी बहन का कंकाल कब्र से निकालकर करीब 3 किलोमीटर पैदल चला और बैंक के दरवाजे पर रख दिया । सोचिए , कितनी बेबसी रही होगी कि एक भाई को यह कदम उठाना पड़ा ।कंकाल देखकर खुली संवेदनशीलता की पोल
जैसे ही कंकाल बैंक पहुंचा , अफरा-तफरी मच गई । वही कर्मचारी , जो जिंदा इंसान की बात नहीं सुन रहे थे , अब पुलिस को फोन करने लगे । क्या इंसानियत अब सिर्फ कागजों और नियमों की गुलाम बनकर रह गई है ?पुलिस ने संभाला मामला , सिस्टम फिर कटघरे में
थाना प्रभारी किरण प्रसाद साहू ने साफ कहा - जीतू अनपढ़ है , उसे प्रक्रिया नहीं पता थी । लेकिन सवाल ये है कि क्या बैंक का काम सिर्फ नियम गिनाना है , या लोगों को रास्ता दिखाना भी ? आखिरकार पुलिस और प्रशासन को बीच में आना पड़ा और जीतू को उसका हक दिलाने का भरोसा दिया गया ।20 हजार के लिए इतना बड़ा संघर्ष क्यों ?
कालरा मुंडा की मौत 26 जनवरी 2026 को हो चुकी थी । पति और बेटे पहले ही गुजर चुके थे । जीतू ही एकमात्र वारिस है । गरीबी से जूझते इस परिवार के लिए ये 20 हजार रुपये कोई मामूली रकम नहीं , बल्कि जीवन का सहारा थे । अब सवाल ये है - क्या नियम इतने कठोर हो गए हैं कि इंसानियत की कोई जगह ही नहीं बची ?
क्या एक अनपढ़ आदिवासी को उसका हक दिलाने के लिए उसे अपनी बहन का कंकाल ढोना पड़ेगा ? यह घटना बता रही है कि समस्या सिर्फ सिस्टम में नहीं , बल्कि उसे चलाने वालों की सोच में भी है । अगर समय रहते किसी ने इंसानियत दिखाई होती , तो आज ये तस्वीर देश को शर्मसार नहीं करती ।
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