डीएम का तुगलकी फरमान या गोपनीयता का बहाना ? जनसुनवाई में कैमरों पर रोक से बवाल
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
जनसुनवाई में फरियादियों की वीडियोग्राफी बंद , क्या शिकायतों को कैमरों से दूर रखने की तैयारी ?
बागेश्वर ( Bageshwar ) - जिले में नवनियुक्त डीएम अपूर्वा पांडेय के कार्यभार संभालते ही जिला प्रशासन का एक ऐसा आदेश सामने आया है , जिसने पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । सूचना विभाग ने मीडिया प्रतिनिधियों से जनसुनवाई में पहुंचने वाले फरियादियों और शिकायतकर्ताओं की वीडियोग्राफी नहीं करने का अनुरोध किया है । प्रशासन इसे गोपनीयता की रक्षा का कदम बता रहा है , लेकिन जिले में इस फैसले को जनता की आवाज को दबाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है ।जनता बोलेगी , लेकिन कैमरा नहीं दिखाएगा
नए निर्देश के अनुसार अब जनसुनवाई के दृश्य और वीडियो मीडिया खुद नहीं बना सकेगा । इसके बजाय सूचना विभाग अपने स्तर पर रिकॉर्ड किए गए विजुअल्स मीडिया को उपलब्ध कराएगा । ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब जनता की पीड़ा , टूटी सड़कें , पेयजल संकट , सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते लोग और प्रशासनिक लापरवाही के दृश्य कैमरों तक पहुंच ही नहीं पाएंगे ?गोपनीयता या नाकामियों पर पर्दा ?
आलोचकों का कहना है कि जनसुनवाई कोई निजी कार्यक्रम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सार्वजनिक मंच है , जहां आम नागरिक अपनी समस्याएं प्रशासन के सामने रखता है । ऐसे में मीडिया की मौजूदगी पर अप्रत्यक्ष अंकुश लगाना कहीं प्रशासनिक नाकामियों और जनता के आक्रोश को सुर्खियां बनने से रोकने की कोशिश तो नहीं ?चुनावी साल में क्यों आया यह आदेश ?
सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि विधानसभा चुनाव से पहले यह फैसला क्यों लिया गया । राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी माहौल में सरकार और प्रशासन जनता की नाराजगी , शिकायतों और बदहाल व्यवस्थाओं की तस्वीरों को सार्वजनिक होने से रोकना चाहते हैं । यही वजह है कि इस आदेश को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं ।पत्रकारों में रोष , कहा - लोकतंत्र में नहीं चलेंगी बंदिशें
स्थानीय पत्रकारों और मीडिया संगठनों ने आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई है । उनका कहना है कि मीडिया का काम सरकार और प्रशासन की उपलब्धियों के साथ-साथ जनता की समस्याओं को भी सामने लाना है । यदि विजुअल्स भी प्रशासन ही तय करेगा , तो निष्पक्ष रिपोर्टिंग कैसे संभव होगी ?पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण का हमला
कपकोट के पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण ने आदेश को तुगलकी फरमान करार देते हुए कहा कि सरकार जिला प्रशासन के माध्यम से पत्रकारों को जनता की वास्तविक समस्याओं से दूर रखना चाहती है । उन्होंने कहा कि गोपनीयता का तर्क केवल बहाना है , असली मकसद व्यवस्था की खामियों और जन असंतोष को छिपाना है । अब सबसे बड़ा सवाल ये है - क्या बागेश्वर में अब जनता अपनी समस्या तो बता सकेगी , लेकिन उसकी आवाज और दर्द कैमरों तक नहीं पहुंच पाएगा ? क्या गोपनीयता की आड़ में प्रशासन अपनी छवि बचाने की कवायद कर रहा है ? डीएम के कार्यभार संभालते ही जारी हुए इस आदेश ने जिले में पारदर्शिता , प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है ।
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