संपादकीय : पत्रकारिता या दरबारिता ? आखिर जनता की आवाज़ कौन उठाएगा ?
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
संपादकीय
कभी पत्रकार सत्ता के गलियारों में सवाल लेकर जाते थे , आज कई जगह सवाल छोड़कर सलाम लेकर जाते दिखाई दे रहे हैं । कभी पत्रकार जनता और सरकार के बीच पुल हुआ करते थे , अब कुछ लोग सत्ता और जनता के बीच दीवार बनने में गर्व महसूस कर रहे हैं । सवाल यह है कि पत्रकारिता बदल गई है या पत्रकारिता के नाम पर कुछ और शुरू हो गया है ? आजकल एक नया चलन देखने को मिल रहा है । जैसे ही कोई नेता या अधिकारी निकलता है , कुछ तथाकथित पत्रकार अपनी मोटरसाइकिलें स्टार्ट कर उनकी गाड़ियों के पीछे ऐसे दौड़ पड़ते हैं मानो सरकारी काफिले के सदस्य हों । कैमरा जनता की टूटी सड़क पर नहीं पहुंचता , लेकिन साहब की गाड़ी के पीछे उड़ती धूल को रिकॉर्ड करने में पूरी ऊर्जा लगा दी जाती है । ऐसा लगता है मानो पत्रकार नहीं , बल्कि चलता-फिरता स्वागत दल हो ।सवाल यह है कि आखिर पत्रकार का काम क्या है ?
क्या पत्रकार का काम अधिकारियों की गाड़ियों की धूल खाना है या जनता की समस्याओं की धूल झाड़ना ? क्या पत्रकार का काम नेताओं के भाषणों की ताली बजाना है या उनके वादों का हिसाब मांगना ? क्या पत्रकार का काम सत्ता के लिए ढाल बनना है या जनता के लिए आवाज़ बनना ? विडंबना देखिए , जो लोग कभी सवाल पूछने की हिम्मत रखते थे , वे आज सवाल पूछने से डर रहे हैं । और जो कल तक सत्ता के आगे खड़े होकर जवाब मांगते थे , वे आज सेल्फी और बाइट लेने को ही उपलब्धि समझ बैठे हैं । सच दिखाने में डर लग रहा है लेकिन चमचागिरी करने में बहादुरी महसूस हो रही है । चुनाव आते ही यह बीमारी और बढ़ जाती है । कुछ मंचों पर खबरें कम और प्रचार ज्यादा दिखाई देता है । विश्लेषण कम और पक्षधरता ज्यादा दिखती है । जनता के मुद्दे गायब हो जाते हैं और नेताओं की छवि चमकाने की प्रतियोगिता शुरू हो जाती है । लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहीं-कहीं चुनावी पोस्टर की तरह व्यवहार करने लगता है । सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोगों की वजह से पूरी पत्रकार बिरादरी कटघरे में खड़ी कर दी जाती है । जबकि आज भी हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो धूप में खड़े होकर , जोखिम उठाकर , दबाव झेलकर सच सामने ला रहे हैं । आज भी ऐसे पत्रकार हैं जिनकी कलम बिकती नहीं , झुकती नहीं और डरती नहीं । लेकिन कुछ चुनिंदा मछलियां पूरे तालाब को गंदा कर रही हैं । कुछ लोगों की दलाली ने पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है । नतीजा यह हुआ कि समाज में पत्रकारों के प्रति सम्मान पहले जैसा नहीं रहा । जनता अब खबर सुनने से पहले खबर सुनाने वाले का एजेंडा तलाशने लगी है । इसलिए डंके की चोट पर कहना पड़ता है कि पत्रकार दलाल नहीं हैं , बल्कि दलाल लोग पत्रकार बन बैठे हैं । याद रखिए , पत्रकारिता का असली धर्म सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं , सच के साथ खड़ा होना है । पत्रकारिता का काम सरकार गिराना भी नहीं है और सरकार बचाना भी नहीं है । पत्रकारिता का काम सिर्फ इतना है कि जनता को सच दिखाया जाए और सत्ता से सवाल पूछे जाएं । जिस दिन पत्रकार जनता की समस्याओं के पीछे उसी रफ्तार से भागने लगेंगे , जिस रफ्तार से कुछ लोग नेताओं और अधिकारियों की गाड़ियों के पीछे भागते हैं , उस दिन शायद किसी गरीब की आवाज़ दबेगी नहीं , किसी गांव की समस्या अनसुनी नहीं होगी और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ फिर से अपने असली कद में दिखाई देगा । वरना इतिहास एक दिन यही लिखेगा कि कुछ लोग पत्रकारिता करने नहीं निकले थे , बल्कि पत्रकारिता की वर्दी पहनकर दरबार सजाने निकले थे ।