सम्मान किसका ? पत्रकार का या दरबारी का ?
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
संपादकीय - सूरज लडवाल
वो भी एक दौर था जब , पत्रकारिता कभी सत्ता के दरबार की चौखट पर खड़े होकर माननीय जी कहने का पेशा नहीं थी । पत्रकारिता तो वह आईना थी , जिसमें सत्ता को अपना असली चेहरा दिखाई देता था । लेकिन अफसोस ! आज पत्रकारिता के कुछ चेहरों पर ऐसा चश्मा चढ़ गया है , जिसमें जनता की तकलीफ धुंधली और नेताओं की मुस्कान बिल्कुल साफ दिखाई देती है । अब तो खबरों में भी जरूरत से ज्यादा माननीय और जी जोड़ना शुरू हो गया है । अब तो सवाल पूछने की जगह प्रशंसा होने लगी है । और हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि कुछ पत्रकार जिम्मेदार व्यक्ति की गाड़ी के पीछे अपनी मोटरसाइकिल दौड़ाते नजर आते हैं , मानो पत्रकार नहीं , पीए की ड्यूटी निभा रहे हों ।पत्रकारिता है या खुशामद की नई परंपरा हो गई ?
सवाल यह नहीं है कि , किसी जनप्रतिनिधि का सम्मान क्यों किया जाए । सम्मान हर व्यक्ति का होना चाहिए । सवाल यह है कि क्या सम्मान के नाम पर पत्रकारिता की रीढ़ भी झुका दी जाए ? परेशान जनता पूछती है - देश चांद तक पहुंच गया है , लेकिन गांव तक सड़क क्यों नहीं पहुंची ? अस्पताल का उच्चीकरण क्यों नहीं हो रहा और व्यवस्था ठीक क्यों नहीं है ? स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं और प्रधानाचार्यों की नियुक्ति क्यों नहीं हो रही है ? जर्जर स्कूलों की मरम्मत पर अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे ? योजनाओं का लाभ जरूरतमंद तक क्यों नहीं पहुंच रहा ? , ग्रामीणों को पानी क्यों नहीं मिल रहा है ? लेकिन कुछ कैमरों का फोकस इन सवालों से हटकर नेताओं के स्वागत , माल्यार्पण , मुस्कान और बयान पर टिक गया है । यानी , जहां जनता को सवाल चाहिए , वहां वाहवाही परोसी जा रही है ।सोशल मीडिया अकाउंट संभालना और पत्रकारिता करना - दो अलग बातें हैं
सोशल मीडिया आज सूचना का महत्वपूर्ण माध्यम है । सोशल मीडिया अकाउंट चलाना भी एक जिम्मेदारी है । लेकिन किसी नेता , संस्था या व्यक्ति का सोशल मीडिया अकाउंट संभाल लेने भर से कोई पत्रकार नहीं बन जाता । पत्रकारिता के लिए सवाल चाहिए , तथ्य चाहिए , पड़ताल चाहिए और सबसे बढ़कर सत्ता से असहमत होने का साहस चाहिए । फेसबुक पर पोस्ट डाल देना , कैमरा उठाकर वीडियो बना देना या किसी कार्यक्रम की लाइव कवरेज कर देना पत्रकारिता का पूरा प्रमाणपत्र नहीं है ।अरे भाई ये न्यूज है , या ब्लॉग
वीडियो पत्रकारिता ने खबरों को जनता तक पहुंचाना आसान बनाया है । लेकिन इसी के साथ एक नई समस्या भी पैदा हुई है । कुछ वीडियो देखकर लगता है कि न्यूज कम और ब्लॉग ज्यादा है । खबर की गंभीरता के बीच अनावश्यक संवाद , फिल्मी अंदाज , जरूरत से ज्यादा व्यक्तिगत प्रस्तुति और ऊपर से बैकग्राउंड में गाने चिपका देना , क्या यही पत्रकारिता का नया स्वरूप है ? खबर में संगीत नहीं , तथ्य की आवाज महत्वपूर्ण होनी चाहिए ।ये इंटरव्यू है या साहेब का इमेज मेकओवर ?
इंटरव्यू पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है । लेकिन इंटरव्यू तब सार्थक है , जब पत्रकार सवाल पूछे और कठिन सवाल पूछे , जवाब मांगे और जवाब से अगला सवाल निकाले । अगर पत्रकार पहले ही तय कर ले कि सामने बैठे नेता की छवि चमकानी है , फिर सवाल भी उसी हिसाब से चुने जाएं , तो वह इंटरव्यू नहीं , इमेज मेकओवर बन जाता है । और जब इंटरव्यू के लिए खुशामद की जाए , बार-बार आग्रह किया जाए और कैमरे के सामने नेता को ऐसे प्रस्तुत किया जाए जैसे पत्रकार ने उन्हें अगला चुनाव जिताने की जिम्मेदारी ले ली हो , तब सवाल उठना स्वाभाविक है - आखिर पत्रकार किसके लिए काम कर रहा है , जनता के लिए या नेता के लिए ?जनता अब सब देख रही है बाबू
सबसे बड़ी भूल यह है कि कुछ लोग जनता को अब भी भोला समझते हैं । लेकिन सोशल मीडिया के दौर में जनता सब देख रही है । कौन सवाल पूछता है , कौन सिर्फ प्रशंसा करता है । कौन जनता की समस्या उठाता है , कौन नेता के कार्यक्रम में आगे बैठता है । कौन व्यवस्था से जवाब मांगता है , कौन व्यवस्था की आरती उतारता है । आज भी जनता की नजर में पत्रकार की पहचान उसके कैमरे से नहीं , उसके सवालों से होती है ।कुछ ईमानदारों की बदौलत फिर भी उम्मीद जिंदा है
इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है । आज भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो बिना किसी तामझाम के जमीन पर खड़े हैं । जो गांव की टूटी सड़क को खबर बनाते हैं , अस्पताल की अव्यवस्था पर सवाल उठाते हैं , गरीब की आवाज को जगह देते हैं और सत्ता से पूछते हैं । ऐसे पत्रकारों की संख्या भले कम हो , लेकिन पत्रकारिता की असली उम्मीद इन्हीं से जिंदा है । क्योंकि पत्रकारिता भीड़ से नहीं , चरित्र से बड़ी होती है ।फैसला अब जनता को करना है
आखिर सम्मान किसका होना चाहिए ? उसका , जो हर खबर में माननीय जी लगाकर अपनी नजदीकी दिखाता है ? या उसका , जो उसी माननीय से जनता के सवालों का जवाब मांगता है ? जो गाड़ी के पीछे मोटरसाइकिल दौड़ाता है ? या उसका , जो ग्रामीणों की बात पहुंचता है ? उसका , जो नेताओं की वाहवाही करता है ? या उसका , जो जनता की परेशानी को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाता है ? फैसला पत्रकारों को नहीं , जनता को करना है । क्योंकि पत्रकारिता का असली सम्मान किसी नेता के हाथों मिले शॉल , माला या मंच से नहीं मिलता । असली सम्मान तब मिलता है , जब कोई आम आदमी कहे - इस पत्रकार ने हमारी आवाज उठाई थी । और शायद यही वह कसौटी है , जिस पर आज हर पत्रकार को खुद से ये सवाल जरूर पूछना चाहिए - मैं पत्रकार हूं या सिर्फ पत्रकार कहलाता हूं ?
सूरज लडवाल
संपादक , उत्तराखंड हिंदी समाचार