बिग ब्रेकिंग : 15 अगस्त से पहले पूर्व सूबेदार की डोली वाली तस्वीर ने खोली विकास की पोल
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
आजादी के 79 साल बाद भी भंडारीगांव में मरीज डोली पर क्यों ?
बागेश्वर ( बागेश्वर ) - देश 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा है । गांव-गांव विकास , सड़क और बेहतर सुविधाओं की बातें होंगी , लेकिन बागेश्वर के कांडा क्षेत्र का अटल आदर्श गांव भंडारीगांव इस विकास की तस्वीर पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है । यहां आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा नहीं पहुंची है । हालात इतने बदहाल हैं कि किसी ग्रामीण की तबीयत बिगड़ जाए तो उसे अस्पताल तक पहुंचाने से पहले डोली में उठाकर सड़क तक ले जाना पड़ता है ।पूर्व सूबेदार की बिगड़ी तबीयत , डोली बनी सहारा
शुक्रवार को पूर्व सूबेदार भूपाल सिंह रावत की तबीयत अचानक बिगड़ गई । इसके बाद ग्रामीणों और ग्राम प्रधान ने उन्हें डोली के सहारे पैदल रास्ते से सड़क तक पहुंचाया । सड़क तक पहुंचने के बाद उन्हें उपचार के लिए ले जाया गया । यह तस्वीर सिर्फ एक मरीज की मजबूरी नहीं , बल्कि भंडारीगांव की वर्षों पुरानी समस्या की हकीकत सामने रखती है । और डोली में बैठा व्यक्ति वही भूपाल सिंह रावत थे , जो तिरंगे की खातिर मर - मिटने की कसम खाते हुए देश सेवा करते थे । लेकिन आज देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले भूपाल सिंह के डोली के सहारे अस्पताल पहुंच रहे हैं ।15 साल से सड़क की मांग , फिर भी समाधान नहीं
ग्रामीणों के अनुसार भंडारीगांव को सड़क से जोड़ने की मांग करीब 15 वर्षों से लगातार उठाई जा रही है । ग्रामीण कई बार शासन-प्रशासन के दरवाजे खटखटा चुके हैं और अपनी मांग को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं , लेकिन अब तक सड़क निर्माण का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया । सवाल यह है कि 15 साल की मांग के बाद भी आखिर भंडारीगांव सड़क से दूर क्यों है ?स्वतंत्रता सेनानियों की धरती , लेकिन विकास से दूरी
भंडारीगांव की स्थिति इसलिए और ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि इस गांव ने देश को स्वतंत्रता सेनानी त्रिलोक सिंह डसीला और पदम सिंह डसीला जैसे दो सेनानी दिए हैं । जिस धरती के लोगों ने देश की आजादी में योगदान दिया , उसी गांव के ग्रामीण आजादी के दशकों बाद भी सड़क जैसी मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं । क्या यह आजादी के अमृतकाल और विकास के दावों के बीच एक बड़ा विरोधाभास नहीं है ?बुजुर्ग , महिलाएं और मरीज सबसे ज्यादा परेशान
सड़क सुविधा नहीं होने का सबसे बड़ा खामियाजा बुजुर्गों , महिलाओं और गंभीर मरीजों को उठाना पड़ता है । आपात स्थिति में मरीज को पहले डोली के सहारे पैदल रास्ते से सड़क तक पहुंचाना पड़ता है और उसके बाद ही वाहन से अस्पताल ले जाना संभव हो पाता है ।जब कुछ मिनटों की देरी जिंदगी और मौत के बीच फर्क कर सकती है , तब सड़क तक पहुंचने में लगने वाला यह अतिरिक्त सफर कितना भारी पड़ता होगा ?ग्राम प्रधान ने सरकार पर साधा निशाना
ग्राम प्रधान कुंदन बोरा ने गांव की बदहाल स्थिति के लिए विधायक समेत शासन-प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगाया । उन्होंने कहा कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है , लेकिन समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है । उन्होंने कहा कि एक ओर 15 अगस्त को देश विकास और तरक्की का जश्न मनाएगा , वहीं दूसरी ओर भंडारीगांव के ग्रामीण मरीजों को डोली में ढोने को मजबूर होंगे ।विधायक बोले - सड़क से जोड़ने की कोशिश जारी
कार्यकाल के अंतिम चरण में पहुंच चुके कपकोट विधायक सुरेश गड़िया ने कहा कि सरकार हर गांव को सड़क सुविधा से जोड़ने के लिए काम कर रही है । जो गांव अभी सड़क सुविधा से वंचित हैं , उन्हें भी जल्द यातायात सुविधा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है । उन्होंने बताया कि इसके लिए संबंधित विभागों को सर्वे के निर्देश दिए गए हैं ।अब सवाल जवाब का नहीं , जमीन पर काम का है
भंडारीगांव के ग्रामीणों के लिए सड़क अब कोई नई मांग नहीं रह गई है । 15 साल की मांग , आंदोलन और बार-बार उठती आवाज के बाद अब सवाल यह है कि सड़क कब बनेगी ? 15 अगस्त को जब देश आजादी का जश्न मनाएगा , तब भंडारीगांव की यह तस्वीर व्यवस्था से एक सीधा सवाल पूछेगी - क्या आजादी के 79 साल बाद भी एक गांव को मरीज को डोली में सड़क तक पहुंचाने की मजबूरी से आजादी नहीं मिल सकती ? उत्तराखंड हिंदी समाचार की नजर अब इस बात पर रहेगी कि सर्वे के बाद भंडारीगांव की सड़क कब धरातल पर उतरती है ।
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