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Thursday, 20-August-2026

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कांवड़ यात्रा : कौन है ये लोग ? क्यों और कहाँ से आये हैं ? - Uttarakhand Hindi Samachar

Posted by admin
Posted Date: 2026-08-15 22:47:16
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कांवड़ यात्रा : कौन है ये लोग ? क्यों और कहाँ से आये हैं ?


(Report - uttarakhandhindisamachar.com)

🖋️आलेख - बादल सरोज

इधर गिनकर बताया जा रहा है कि कुल कांवड़िए चार करोड़ 80 लाख 40 हजार थे , जो पिछले साल से 28 लाख ज्यादा हैं । उधर सोशल मीडिया उनकी हरकतों के आयाम से लिपा-पुता पड़ा है । कहीं डीजे पर थिरकते पाँव और लहराती कमर है , कहीं बीयर की खाली केन्स और धुआं-धुआं चिलम है ! रास्ते भर मचाये उत्पातों की खबरें हैं , तार-तार वर्दी करवाने के बावजूद श्रद्धा से फूल बरसाती पुलिस की तस्वीरें हैं । कहीं सराहने और सत्कारने का उन्माद है , तो कहीं धिक्कारने और नकारने की जल्दी है । इस तरह सब कुछ है , बस वही नहीं है , जिसकी वजह से यह जो कुछ है , वह धीरे-धीरे बहुत कुछ में बदलता जा रहा है । जरूरत यह जानने की है कि क्या है यह सब ? कौन है ये लोग ? क्यों और कहाँ से आये हैं ?

यह अचानक आया धार्मिकता का ज्वार नहीं है । यह कांवड़ ले जाने के प्रति अनायास उमड़ा भाव या गंगाजल लाने के लिए उफना अनुराग नहीं है । यह एक बड़ी - बहुतई बड़ी - अत्यंत गंभीर राजनीतिक परियोजना है । रोजगार विहीन , दरिद्र भारत की युवतर पीढ़ी को भीड़ में बदलकर उन्मादी , हिंसक और बर्बर बनाने की महापरियोजना है । इसमें सिर्फ सरकारें या प्रशासन भर ही नहीं लगे हैं , भाजपा और आरएसएस का पूरा कुनबा इसमें तन , मन , धन से जुटा हुआ है । कांवड़ों को प्रेरित और प्रोत्साहित किये जाने कोटे बांटे गए हैं , उन्हें 10-10 हजार प्रति कांवड़ के हिसाब से पैसा मुहैया कराने के जिम्मे दिए गए हैं । पूरे रास्ते भर कांवड़ियों के स्वागत सत्कार और भंडारों की व्यवस्थाएं , फूलमालाओं से उनके स्वागत के इंतजाम किये गए हैं । इनमें कई भंडारों में शिव के प्रसाद के बहाने बूटी और आसव , घोंटा और चिलम जैसे आस्वादों की भी व्यवस्था है , जो नियमतः धार्मिक यात्राओं में वर्जित मानी जाती है । विधायकों , सांसदों , जिला परिषदों के प्रमुखों और भविष्य में यह सब बनने के लिए आतुरों को काम पर लगाया गया है । उनके किये की निगरानी के लिए संघ प्रचारकों को नियुक्त किया गया है ।

यह संयोग नहीं है कि कांवड़ियों का विराट बहुमत उन जातियों का है , जिनकी पहुँच से ब्राह्मण और उसके पूजा स्थल सदा से बाहर हैं । इसमें जाने वाले ज्यादातर लोग दलित हैं या फिर उन अति पिछड़ी जातियों के हैं , जिन्हें आम बोलचाल में भले ओबीसी कहा जाने लगा हो , मगर शास्त्र सम्मत शब्दावली में शूद्र ही माना जाता है । कांवड़ यात्रा के बाद भी उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता । ऐसी अनेक घटनाएं हर साल अखबारों में छपती रहती हैं , जिनमें गंगा से लाये पानी से अपने गाँव के शिवालय में लगी शिव की मूर्ति का जलाभिषेक करने से इसलिए रोक दिया गया , क्योंकि कांवड़िया शूद्र या कथित नीची जाति का था । कई जगहों पर ऐसा करने की कोशिश करने वाले कांवड़ियों पर हमले हुए , कुछ की तो इन हमलों में मौतें तक हो गयीं ।

आम नागरिकों , दुकानदारों , सडक चलते लोगों को मारने वाली भीड़ में अधिकाँश वे लोग हैं , जो जहाँ से आये हैं , वहां खुद पिटते रहते हैं । इस कुछ दिन की यात्रा के बाद गांव बस्ती के अपने घर लौटकर फिर उसी हर तरह की पिटाई की यंत्रणा को झेलना है । उनकी यही दमित कुंठा और खीज है , जिसे इस तरह सजा-संवार कर संघ भाजपा ऐसी हिंसक भीड़ में बदल देना चाहता है , जो उसके फासीवादी एजेंडे के हमलों के समय मैदानी गुर्गों , फुट सोल्जर्स के रूप में इस्तेमाल की जा सके । उन्हें प्रोत्साहित करने वाले जानते हैं कि इस प्रक्रिया से गुजरते में कांवड़ियों के व्यक्तित्व , सोच और रुझान में एक ऐसा परिवर्तन लाया जा सकता है , जिसके चलते वह जो अब तक उनका नहीं है , वह कुछ-कुछ उनका हो सकता है , देर-सबेर उसे पूरा अपना बनाया जा सकता है । इसके लिए महत्वपूर्ण होने का नकली अहसास पूरे विधि-विधान से पैदा किया जाता है ।  

जब ये गरीब गुरबे , निम्न मध्यवर्गीय श्रद्धालु कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं , तो शहर के वणिक व्यापारी अपने नौनिहालों को किसी आईआईटी , आईएएस कोचिंग या लन्दन , पेरिस , ऑस्ट्रेलिया पढ़ने के लिए भेजने के पुण्यकार्य से निवृत्त होने के बाद अपनी महँगी कारों में , सजे-धजे परिवार के साथ लदकर कांवड़ियों को स्टेशन और बस अड्डे पर विदा करने आते हैं । उन्हें पत्रम , पुष्पम , वस्त्रम , द्रव्यम देकर उनके मन में खुद के प्रति कुछ क्षणों के आभासीय आत्मगौरव की गलतफहमी और दाताओं के प्रति श्रद्धा और आदर भाव  पैदा करते हैं । यह सब करने के बाद वे वापस अपने वातानुकूलित ड्राइंग रूम्स में पहुँच कर - घर घर में कांवड़िया पैदा होना चाहिए , मेरे घर को छोड़कर का जाप करते हुए निश्चिंतता की नींद सो जाते हैं । धर्म के प्रति इनकी प्रतिबद्धता इतनी अगाध चुनिन्दा और सजग होती है कि ये भूले से भी अपने घर , परिवार या रिश्तेदार को ऐसी यात्रा पर नहीं भेजते । कहने की जरूरत नही कि यह विदाई समारोह स्वतःस्फूर्त नहीं होता , उस इलाके के नेकरिया भाई साहब और भाजपा शासित प्रदेशों में प्रशासनिक अमला बाकायदा योजना बनाकर इसे करता है । इस साढ़े चार करोड़ की भीड़ में किसी सांसद , विधायक , मंत्री , भाजपा या संघ के नेता का पूत-सपूत नहीं दिखाई देता । इसका आस्था , धर्म या श्रद्धा से कोई लेना देना नहीं है । यह ध्रुवीकरण तेज करने की राजनीतिक परियोजना है , जो मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के साथ उनके प्रति विषैले , नफरती उन्माद को उभारने का काम भी करती जाती है । इस पूरी यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली दुकानों , ढाबों , रेस्तराओं के मालिकों की पहचान सार्वजनिक करने की मुहिम इसी तरह की हरकत है । हिन्दू मालिकों के रेस्तराओ में काम करने वाले कर्मचारियों की भी जांच-पड़ताल की जा रही है । हालांकि इस सबमें भी नया या मौलिक कुछ भी नहीं है । सारा तरीका और उसे अमल में लाने की प्रक्रिया सीधे-सीधे हिटलर और मुसोलिनी के किये-धरे से उठाई गयी है । मकसद वही है , जो मनुष्यता के अब तक के सबसे बड़े इन दोनों अपराधियों का था । लम्पट , हिंसक , हमलावर और अराजक भीड़ तैयार करना और उसे ऐसे काम पर लगाना , जो मूलतः खुद उनके ही खिलाफ है ।

इस तरह असल में यह वह भीड़ है , जो जलूस में नहीं बदल पायी । अपने मूल अर्थ में यह वह परियोजना है , जो इस भीड़ को जलूस में बदलते नहीं देखना चाहती । रास्ते इन्हें नकारने , धिक्कारने से नहीं , उस साजिश को समझने से निकलेंगे , जिसके ये शिकार हैं । यदि भीड़ बने लोग आज इसे नहीं समझ पा रहे हैं , तो जो समझ सकते हैं , वे तो समझें कि जरूरत इन्हें कोसने की नहीं , इनके पास जाकर , इनके साथ , इनका हाथ पकड़कर बैठने की है । उनके दुःख को समझने , धीरज से उनकी बात सुनने , उसका कारण बताने और समाधान समझाने की है , उपदेश की नहीं , संवाद की है । नाउम्मीदी खत्म करने का एक ही रास्ता होता है , उम्मीद जगाना ।
चतुर मनुजाये यदि इन्हें खुद अपने खिलाफ इस्तेमाल होने वाली तलवार की धार तेज करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं , तो उन्हें गरियाने और दुत्कारने की बजाय यह बताना होगा कि जिस अंधश्रद्धा और अंधविश्वास से उनका मनुष्यत्व छीना जा रहा है , वह धर्म नहीं है , शिकारियों का बिछाया जाल है । राज करने वालों की खुद को बचाने के लिए रची गयी धूर्त चाल है । धीरज के साथ उन्हें बताना होगा कि जिन दुखों , पीड़ाओं और निराशाओं का समाधान ढूँढने के मुगालते में कांवड़ उठाये वे जिनका मोहरा बन रहे है , वे ही उनकी इस दशा के जिम्मेदार हैं । यह भी कि देश में संपदा और धनधान्य इतनी इफरात में है कि एक भी व्यक्ति भूखा नहीं सो सकता । इतनी सामर्थ्य और संभावना है कि 18 वर्ष के ऊपर का एक भी भारतीय रोजगार के बिना नहीं रह सकता , कोई किसान कंगाल और कोई इंसान भूखा नहीं रह सकता । इतना उत्पादन और मुनाफ़ा है कि हर मजदूर-कर्मचारी को कच्चा नहीं पक्का रोजगार , मिनिमम ही नहीं , लिविंग वेज पर दिया जा सकता है ।

( लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं ।

Disclaimer - The article titled Kanwar Yatra : Who Are These People ? Why and Where Have They Come From ? has been written by Badal Saroj. The views, opinions, allegations, analysis and conclusions expressed in this article are entirely those of the author.

The publication of this article by Uttarakhand Hindi Samachar does not imply endorsement, agreement or support of the views expressed by the author. Uttarakhand Hindi Samachar shall not be held responsible for any statement, opinion, allegation, political or ideological commentary, or any dispute arising from the contents of this article.

The article is published solely to present the author’s views and facilitate public discussion and debate.


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