कांवड़ यात्रा : कौन है ये लोग ? क्यों और कहाँ से आये हैं ?
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
🖋️आलेख - बादल सरोज
इधर गिनकर बताया जा रहा है कि कुल कांवड़िए चार करोड़ 80 लाख 40 हजार थे , जो पिछले साल से 28 लाख ज्यादा हैं । उधर सोशल मीडिया उनकी हरकतों के आयाम से लिपा-पुता पड़ा है । कहीं डीजे पर थिरकते पाँव और लहराती कमर है , कहीं बीयर की खाली केन्स और धुआं-धुआं चिलम है ! रास्ते भर मचाये उत्पातों की खबरें हैं , तार-तार वर्दी करवाने के बावजूद श्रद्धा से फूल बरसाती पुलिस की तस्वीरें हैं । कहीं सराहने और सत्कारने का उन्माद है , तो कहीं धिक्कारने और नकारने की जल्दी है । इस तरह सब कुछ है , बस वही नहीं है , जिसकी वजह से यह जो कुछ है , वह धीरे-धीरे बहुत कुछ में बदलता जा रहा है । जरूरत यह जानने की है कि क्या है यह सब ? कौन है ये लोग ? क्यों और कहाँ से आये हैं ?
यह अचानक आया धार्मिकता का ज्वार नहीं है । यह कांवड़ ले जाने के प्रति अनायास उमड़ा भाव या गंगाजल लाने के लिए उफना अनुराग नहीं है । यह एक बड़ी - बहुतई बड़ी - अत्यंत गंभीर राजनीतिक परियोजना है । रोजगार विहीन , दरिद्र भारत की युवतर पीढ़ी को भीड़ में बदलकर उन्मादी , हिंसक और बर्बर बनाने की महापरियोजना है । इसमें सिर्फ सरकारें या प्रशासन भर ही नहीं लगे हैं , भाजपा और आरएसएस का पूरा कुनबा इसमें तन , मन , धन से जुटा हुआ है । कांवड़ों को प्रेरित और प्रोत्साहित किये जाने कोटे बांटे गए हैं , उन्हें 10-10 हजार प्रति कांवड़ के हिसाब से पैसा मुहैया कराने के जिम्मे दिए गए हैं । पूरे रास्ते भर कांवड़ियों के स्वागत सत्कार और भंडारों की व्यवस्थाएं , फूलमालाओं से उनके स्वागत के इंतजाम किये गए हैं । इनमें कई भंडारों में शिव के प्रसाद के बहाने बूटी और आसव , घोंटा और चिलम जैसे आस्वादों की भी व्यवस्था है , जो नियमतः धार्मिक यात्राओं में वर्जित मानी जाती है । विधायकों , सांसदों , जिला परिषदों के प्रमुखों और भविष्य में यह सब बनने के लिए आतुरों को काम पर लगाया गया है । उनके किये की निगरानी के लिए संघ प्रचारकों को नियुक्त किया गया है ।
यह संयोग नहीं है कि कांवड़ियों का विराट बहुमत उन जातियों का है , जिनकी पहुँच से ब्राह्मण और उसके पूजा स्थल सदा से बाहर हैं । इसमें जाने वाले ज्यादातर लोग दलित हैं या फिर उन अति पिछड़ी जातियों के हैं , जिन्हें आम बोलचाल में भले ओबीसी कहा जाने लगा हो , मगर शास्त्र सम्मत शब्दावली में शूद्र ही माना जाता है । कांवड़ यात्रा के बाद भी उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता । ऐसी अनेक घटनाएं हर साल अखबारों में छपती रहती हैं , जिनमें गंगा से लाये पानी से अपने गाँव के शिवालय में लगी शिव की मूर्ति का जलाभिषेक करने से इसलिए रोक दिया गया , क्योंकि कांवड़िया शूद्र या कथित नीची जाति का था । कई जगहों पर ऐसा करने की कोशिश करने वाले कांवड़ियों पर हमले हुए , कुछ की तो इन हमलों में मौतें तक हो गयीं ।
आम नागरिकों , दुकानदारों , सडक चलते लोगों को मारने वाली भीड़ में अधिकाँश वे लोग हैं , जो जहाँ से आये हैं , वहां खुद पिटते रहते हैं । इस कुछ दिन की यात्रा के बाद गांव बस्ती के अपने घर लौटकर फिर उसी हर तरह की पिटाई की यंत्रणा को झेलना है । उनकी यही दमित कुंठा और खीज है , जिसे इस तरह सजा-संवार कर संघ भाजपा ऐसी हिंसक भीड़ में बदल देना चाहता है , जो उसके फासीवादी एजेंडे के हमलों के समय मैदानी गुर्गों , फुट सोल्जर्स के रूप में इस्तेमाल की जा सके । उन्हें प्रोत्साहित करने वाले जानते हैं कि इस प्रक्रिया से गुजरते में कांवड़ियों के व्यक्तित्व , सोच और रुझान में एक ऐसा परिवर्तन लाया जा सकता है , जिसके चलते वह जो अब तक उनका नहीं है , वह कुछ-कुछ उनका हो सकता है , देर-सबेर उसे पूरा अपना बनाया जा सकता है । इसके लिए महत्वपूर्ण होने का नकली अहसास पूरे विधि-विधान से पैदा किया जाता है ।
जब ये गरीब गुरबे , निम्न मध्यवर्गीय श्रद्धालु कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं , तो शहर के वणिक व्यापारी अपने नौनिहालों को किसी आईआईटी , आईएएस कोचिंग या लन्दन , पेरिस , ऑस्ट्रेलिया पढ़ने के लिए भेजने के पुण्यकार्य से निवृत्त होने के बाद अपनी महँगी कारों में , सजे-धजे परिवार के साथ लदकर कांवड़ियों को स्टेशन और बस अड्डे पर विदा करने आते हैं । उन्हें पत्रम , पुष्पम , वस्त्रम , द्रव्यम देकर उनके मन में खुद के प्रति कुछ क्षणों के आभासीय आत्मगौरव की गलतफहमी और दाताओं के प्रति श्रद्धा और आदर भाव पैदा करते हैं । यह सब करने के बाद वे वापस अपने वातानुकूलित ड्राइंग रूम्स में पहुँच कर - घर घर में कांवड़िया पैदा होना चाहिए , मेरे घर को छोड़कर का जाप करते हुए निश्चिंतता की नींद सो जाते हैं । धर्म के प्रति इनकी प्रतिबद्धता इतनी अगाध चुनिन्दा और सजग होती है कि ये भूले से भी अपने घर , परिवार या रिश्तेदार को ऐसी यात्रा पर नहीं भेजते । कहने की जरूरत नही कि यह विदाई समारोह स्वतःस्फूर्त नहीं होता , उस इलाके के नेकरिया भाई साहब और भाजपा शासित प्रदेशों में प्रशासनिक अमला बाकायदा योजना बनाकर इसे करता है । इस साढ़े चार करोड़ की भीड़ में किसी सांसद , विधायक , मंत्री , भाजपा या संघ के नेता का पूत-सपूत नहीं दिखाई देता । इसका आस्था , धर्म या श्रद्धा से कोई लेना देना नहीं है । यह ध्रुवीकरण तेज करने की राजनीतिक परियोजना है , जो मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के साथ उनके प्रति विषैले , नफरती उन्माद को उभारने का काम भी करती जाती है । इस पूरी यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली दुकानों , ढाबों , रेस्तराओं के मालिकों की पहचान सार्वजनिक करने की मुहिम इसी तरह की हरकत है । हिन्दू मालिकों के रेस्तराओ में काम करने वाले कर्मचारियों की भी जांच-पड़ताल की जा रही है । हालांकि इस सबमें भी नया या मौलिक कुछ भी नहीं है । सारा तरीका और उसे अमल में लाने की प्रक्रिया सीधे-सीधे हिटलर और मुसोलिनी के किये-धरे से उठाई गयी है । मकसद वही है , जो मनुष्यता के अब तक के सबसे बड़े इन दोनों अपराधियों का था । लम्पट , हिंसक , हमलावर और अराजक भीड़ तैयार करना और उसे ऐसे काम पर लगाना , जो मूलतः खुद उनके ही खिलाफ है ।
इस तरह असल में यह वह भीड़ है , जो जलूस में नहीं बदल पायी । अपने मूल अर्थ में यह वह परियोजना है , जो इस भीड़ को जलूस में बदलते नहीं देखना चाहती । रास्ते इन्हें नकारने , धिक्कारने से नहीं , उस साजिश को समझने से निकलेंगे , जिसके ये शिकार हैं । यदि भीड़ बने लोग आज इसे नहीं समझ पा रहे हैं , तो जो समझ सकते हैं , वे तो समझें कि जरूरत इन्हें कोसने की नहीं , इनके पास जाकर , इनके साथ , इनका हाथ पकड़कर बैठने की है । उनके दुःख को समझने , धीरज से उनकी बात सुनने , उसका कारण बताने और समाधान समझाने की है , उपदेश की नहीं , संवाद की है । नाउम्मीदी खत्म करने का एक ही रास्ता होता है , उम्मीद जगाना ।
चतुर मनुजाये यदि इन्हें खुद अपने खिलाफ इस्तेमाल होने वाली तलवार की धार तेज करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं , तो उन्हें गरियाने और दुत्कारने की बजाय यह बताना होगा कि जिस अंधश्रद्धा और अंधविश्वास से उनका मनुष्यत्व छीना जा रहा है , वह धर्म नहीं है , शिकारियों का बिछाया जाल है । राज करने वालों की खुद को बचाने के लिए रची गयी धूर्त चाल है । धीरज के साथ उन्हें बताना होगा कि जिन दुखों , पीड़ाओं और निराशाओं का समाधान ढूँढने के मुगालते में कांवड़ उठाये वे जिनका मोहरा बन रहे है , वे ही उनकी इस दशा के जिम्मेदार हैं । यह भी कि देश में संपदा और धनधान्य इतनी इफरात में है कि एक भी व्यक्ति भूखा नहीं सो सकता । इतनी सामर्थ्य और संभावना है कि 18 वर्ष के ऊपर का एक भी भारतीय रोजगार के बिना नहीं रह सकता , कोई किसान कंगाल और कोई इंसान भूखा नहीं रह सकता । इतना उत्पादन और मुनाफ़ा है कि हर मजदूर-कर्मचारी को कच्चा नहीं पक्का रोजगार , मिनिमम ही नहीं , लिविंग वेज पर दिया जा सकता है ।
( लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं ।
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