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चम्पावत : मुकदमे नहीं , रिश्ते बचाने की जिद ! M.Tech का सपना छोड़ कानून की राह पर चलीं स्मृति जोशी , गरीबों के लिए बनीं न्याय की साथी - Uttarakhand Hindi Samachar

Posted by admin
Posted Date: 2026-08-18 15:57:26
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चम्पावत : मुकदमे नहीं , रिश्ते बचाने की जिद ! M.Tech का सपना छोड़ कानून की राह पर चलीं स्मृति जोशी , गरीबों के लिए बनीं न्याय की साथी


(Report - uttarakhandhindisamachar.com)

चम्पावत ( Champawat ) - कभी एमटेक की डिग्री हासिल कर उत्कृष्ट अभियंता बनने का सपना देखने वाली लोहाघाट की स्मृति जोशी ने जिंदगी के एक कटु अनुभव को अपनी ताकत बना लिया । परिस्थितियों ने उन्हें इंजीनियरिंग की राह से मोड़कर कानून की दुनिया में पहुंचाया और आज वह अधिवक्ता के रूप में गरीब , बेसहारा और विवादों में उलझे लोगों को न्याय की राह दिखाने के साथ-साथ परिवारों को टूटने से बचाने की मुहिम में जुटी हैं ।

एक घटना ने बदल दी जिंदगी की दिशा

स्मृति जोशी का जीवन संघर्ष और संवेदनशीलता की कहानी है । लोहाघाट के प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं स्मृति को समाज के प्रति संवेदनशील रहने की प्रेरणा अपने दादा स्व. बीडी जोशी और पिता स्व. नरेश जोशी से मिली । लेकिन स्वयं के साथ हुई एक घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी । इसी अनुभव ने उन्हें महसूस कराया कि कानून की सही जानकारी और समय पर सही सलाह किसी व्यक्ति के लिए कितनी बड़ी ताकत बन सकती है । इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई करने का निर्णय लिया और ठान लिया कि वह उन लोगों की मदद करेंगी , जो छोटे-छोटे विवादों में वर्षों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहते हैं ।

छोटी सी बात , सालों की मुकदमेबाजी... स्मृति दे रही हैं समझौते का रास्ता

स्मृति का मानना है कि जमीन , संपत्ति और पारिवारिक विवादों की शुरुआत अक्सर बेहद मामूली बातों से होती है । लेकिन जब मामला अदालत तक पहुंच जाता है तो वही विवाद वर्षों तक खिंच सकता है । उनका सीधा संदेश है - हर विवाद का समाधान मुकदमा नहीं होता । यदि परिवार समय रहते आपसी संवाद और समझदारी से विवाद सुलझा लें तो न केवल रिश्ते बचाए जा सकते हैं , बल्कि अदालतों में खर्च होने वाला समय और पैसा भी बच सकता है ।

कोर्ट की फीस से जमीन का टुकड़ा खरीद सकते हैं - स्मृति की बात में बड़ा संदेश

स्मृति लोगों को समझाते हुए कहती हैं कि कई बार लोग मामूली विवाद को लेकर वर्षों तक कोर्ट-कचहरी में पैसा और समय खर्च कर देते हैं । अगर वही विवाद घर की चौखट पर आपसी बातचीत से सुलझ जाए तो परिवार भी बच सकता है और वर्षों में मुकदमे पर खर्च होने वाली रकम से जमीन का एक टुकड़ा तक खरीदा जा सकता है । यही सोच उनकी पहल को आम मुकदमेबाजी से अलग बनाती है ।

फीस नहीं , लोगों का आशीर्वाद पसंद है स्मृति को

स्मृति की पहल की सबसे खास बात यह है कि जरूरतमंद और गरीब लोगों के छोटे विवादों को सुलझाने में वह कई बार किसी तरह की फीस लेने के बजाय उनका आशीर्वाद लेना पसंद करती हैं । कई परिवारों के बीच समझौता कराने में मिली सफलता ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया है । उनके लिए किसी विवाद का फैसला केवल कानूनी जीत-हार नहीं , बल्कि दो परिवारों को बिखरने से बचाना है ।

उम्र छोटी , लेकिन सोच बड़ी - रिश्ते बचाने का संकल्प

स्मृति का मानना है कि उम्र छोटी होना किसी की समझ और दूरदृष्टि को छोटा नहीं करता । यदि लोग समय रहते संवाद , समझदारी और आपसी विश्वास का रास्ता अपनाएं तो वर्षों पुरानी कड़वाहट भी खत्म की जा सकती है । उनका प्रयास है कि कानून को केवल मुकदमेबाजी का हथियार न समझा जाए , बल्कि उसे समझौते, संवाद , सामाजिक सौहार्द और रिश्तों को बचाने का माध्यम भी बनाया जाए ।

कानून की पढ़ाई को बनाया समाजसेवा का माध्यम

आज स्मृति जोशी का प्रयास उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है , जो आर्थिक या सामाजिक कारणों से कानूनी लड़ाई लड़ने में असहज महसूस करते हैं । उनका उद्देश्य विवादों को बढ़ाना नहीं , बल्कि जहां संभव हो वहां बातचीत और समझौते के जरिए समाधान तलाशना है ।

स्मृति की पहल क्यों है अनुकरणीय ?

आज के दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट रहे हैं और मामूली विवाद अदालतों तक पहुंच रहे हैं , वहां स्मृति जोशी की सोच निश्चित रूप से अनुकरणीय है । वह लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही हैं कि अदालत में पहुंचने से पहले यदि संवाद की एक कोशिश कर ली जाए तो कई रिश्ते , समय और धन बचाए जा सकते हैं । कानून की किताबों से निकली यह सोच अब रिश्तों को बचाने की कोशिश बन चुकी है । स्मृति जोशी की यही पहल उन्हें सिर्फ एक अधिवक्ता नहीं , बल्कि समाज में समझौते और न्याय की राह दिखाने वाली संवेदनशील युवा कानूनविद के रूप में अलग पहचान देती है ।





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