हेकड़ी का हिसाब : कानून का पाठ पढ़ाने वाला थानेदार खुद कानून के शिकंजे में , कोर्ट ने सुनाई 2 साल की सजा
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
कानून का पाठ पढ़ाने वाला थानाध्यक्ष खुद कानून के शिकंजे में , कैफे संचालक से मारपीट और जातिसूचक गाली मामले में 2 साल की सजा ।
पिथौरागढ़ ( Pithoragarh ) - दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाने वाली वर्दी जब खुद कानून की किताब के कटघरे में खड़ी हो जाए तो मामला सुर्खियां बनना लाजिमी है । मुनस्यारी के पूर्व थानाध्यक्ष प्रदीप सिंह चौहान के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है । कैफे संचालक से मारपीट , गाली-गलौज और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के मामले में अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए दो साल के कठोर कारावास और 15 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है । विशेष सत्र न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) धर्मेंद्र चतुर्वेदी की अदालत ने यह फैसला सुनाया । यानी जिस वर्दी पर कानून की हिफाजत की जिम्मेदारी थी , जब इस वर्दीधारी ने अपनी धौंस जमाई तो , उसी वर्दीधारी को अब कानून ने अपने शिकंजे में कस दिया है ।कुर्सी से शुरू हुआ विवाद , थाने तक पहुंचा मामला
मामला 14 अक्टूबर 2019 का है । पंचायत चुनाव के दौरान तत्कालीन थानाध्यक्ष प्रदीप सिंह चौहान मुनस्यारी के एक कैफे में पहुंचे थे । अदालत में चले मामले के मुताबिक उन्होंने कैफे संचालक विक्रम सिंह जंगपांगी से कुर्सी की मांग की । गद्दी वालो कुर्सी देने में असमर्थता जताना कैफे संचालक को भारी पड़ गया । आरोप है कि इससे नाराज थानाध्यक्ष ने उसे देख लेने की धमकी दी । मामला उस वक्त तो शांत हो गया , लेकिन कहानी की अगली कड़ी उसी रात लिखी गई ।रात 10 बजे फिर पहुंचे , आरोप है कि जमकर की मारपीट
पीड़ित का आरोप था कि रात करीब 10 बजे आरोपी कैफे के बाहर पहुंचा और उसके साथ मारपीट की । इतना ही नहीं , जातिसूचक गालियां देने का भी आरोप लगाया गया । मारपीट में कैफे संचालक की आंख और नाक पर गंभीर चोटें आईं । इसके बाद पीड़ित शिकायत लेकर मुनस्यारी थाने पहुंचा , लेकिन आरोप है कि वहां भी उसके साथ मारपीट की गई ।250 रुपये का चालान और सादे कागज पर दस्तखत
मामले में आरोप यहीं खत्म नहीं हुए । पीड़ित के मुताबिक उसका 250 रुपये का चालान काटा गया और सादे कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए । कानून की रखवाली का जिम्मा संभालने वाले अधिकारी पर लगे ये आरोप मामले की गंभीरता को और बढ़ाने वाले थे । आखिरकार मामला अदालत तक पहुंचा और वर्षों बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया ।कोर्ट ने सुनाया कानून का हिसाब
विशेष सत्र न्यायाधीश की अदालत ने आरोपी को आईपीसी की धारा 323 , 504 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2) के तहत दोषी मानते हुए दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई । इसके साथ ही एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1) के तहत भी दो साल की सजा और 15 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया ।वर्दी का रौब चला , लेकिन अदालत में कानून का जोर चला
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि वर्दी कानून से ऊपर नहीं होती । थाने में कानून का पाठ पढ़ाने वाला अधिकारी जब खुद आरोपों के घेरे में आया तो मामला अदालत पहुंचा और आखिरकार कानून ने अपना काम किया । कुर्सी देने से शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि एक कैफे संचालक अदालत की चौखट तक पहुंच गया और वर्षों बाद फैसला आया । वर्दी का रौब अपनी जगह , लेकिन कानून का शिकंजा उससे भी मजबूत निकला ।पांच साल से ज्यादा पुराना मामला , अब आया फैसला
2019 में दर्ज इस मामले का फैसला अब आया है । अदालत के निर्णय ने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा किया है कि आम नागरिक के साथ कानून लागू करने वाले तंत्र का व्यवहार कैसा होना चाहिए । कानून व्यवस्था संभालने वालों से ही अगर कानून की मर्यादा टूटने के आरोप लगें , तो न्यायालय की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है । मुनस्यारी का यह मामला इसी विडंबना की तस्वीर है - दूसरों को कानून का डर दिखाने वाला अधिकारी आखिर खुद कानून की अदालत में खड़ा हुआ और सजा का सामना करना पड़ा ।पूर्व एसपी पर भी पड़ चुकी है कानून की नजर
मुनस्यारी के पूर्व थानेदार का मामला कोई इकलौती विडंबना नहीं है । पिथौरागढ़ में ही पूर्व पुलिस कप्तान लोकेश्वर सिंह भी मारपीट और दुर्व्यवहार के गंभीर मामले में कार्रवाई की जद में आ चुके हैं । राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने उन्हें शिकायतकर्ता के साथ मारपीट और प्रताड़ना का दोषी पाया और कार्रवाई की संस्तुति की । बाद में अप्रैल 2026 में अदालत ने भी मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए । कुल मिलाकर कहा जाय तो , वर्दी कानून से बड़ी नहीं होती - जनता पर रौब मारने से पहले याद रखें , वही कानून एक दिन वर्दी का भी हिसाब कर सकता है ।
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