मॉडल जिले हकीकत : चम्पावत जिले में विकास की ये कैसी कहानी ? 8 KM तक डंडे में बंधा रहा किसान
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
चम्पावत से सूरज लडवाल की रिपोर्ट
सड़क नहीं पहुंची , डंडे में बांधकर अस्पताल पहुंचा किसान ! चम्पावत के बकोड़ा की तस्वीर ने खोल दी विकास के दावों की पोल ।
चम्पावत ( Champawat ) - देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है , विकास की रफ्तार गांव-गांव तक पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं , लेकिन चम्पावत जिले की दूरस्थ ग्राम पंचायत बकोड़ा से सामने आई तस्वीर इन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है । यहां आज भी सड़क ग्रामीणों के लिए सपना बनी हुई है । हालात इतने बदतर हैं कि घायल किसान को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को उसे डंडे में बांधकर करीब 8 किलोमीटर तक खराब पैदल रास्ते से ले जाना पड़ा ।नुकीली चीज चुभी , पांच दिन तक दर्द सहता रहा किसान
ग्राम प्रधान रविन्द्र सिंह रावत के अनुसार बकोड़ा ग्राम पंचायत का मोस्टा गांव गहत की खेती के लिए जाना जाता है । गहत की बुवाई के दौरान मोस्टा गांव निवासी किसान दीवान सिंह के पैर में कोई नुकीली चीज चुभ गई । चोट के बाद पैर में दर्द बढ़ता गया । मगर गांव से सड़क तक पहुंचने का रास्ता ही ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया । ऊपर से लगातार बारिश ने खराब पैदल रास्ते को और भी दुर्गम बना दिया । ऐसे में किसान को तत्काल अस्पताल पहुंचाना संभव नहीं हो सका ।यहां , एंबुलेंस नहीं , डंडा बना सहारा
दर्द असहनीय होने पर दीवान सिंह ने ग्रामीणों से मदद मांगी । इसके बाद जो तस्वीर सामने आई , वह व्यवस्था और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को बयां करने के लिए काफी है । ग्रामीणों ने घायल किसान को डंडे में बांधा और करीब 8 किलोमीटर तक खराब पैदल रास्ते से कंधों के सहारे सड़क तक पहुंचाया । घायल किसान को इस तरह ले जाने में ग्रामीणों को कितनी परेशानी हुई होगी , इसका अंदाजा तस्वीर देखकर लगाया जा सकता है । सड़क मार्ग तक पहुंचने के बाद किसान को टीजे मोटरमार्ग के रास्ते टनकपुर अस्पताल ले जाया गया ।मॉडल जिला बनाने की परिकल्पना , लेकिन गांव में सड़क तक नहीं
चम्पावत को मॉडल जिला बनाने की परिकल्पना के बीच बकोड़ा की स्थिति कई सवाल खड़े करती है । एक तरफ आधुनिक विकास की बातें हो रही हैं , वहीं दूसरी ओर जिले के दूरस्थ गांवों में ग्रामीणों को आज भी बुनियादी सड़क सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । गांव में किसी व्यक्ति के बीमार या घायल होने पर समस्या केवल बीमारी तक सीमित नहीं रहती । पहाड़ का खराब रास्ता ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है ।सड़क के अभाव में पलायन की मार
ग्राम प्रधान रविन्द्र सिंह रावत का कहना है कि बकोड़ा क्षेत्र से काफी पलायन हो चुका है । उनके मुताबिक गांव में सड़क नहीं पहुंचना पलायन के प्रमुख कारणों में से एक है । सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं होती । सड़क होने का मतलब है कि किसान अपनी उपज बाजार तक पहुंचा सके , बच्चों को स्कूल तक पहुंचने में आसानी हो और बीमार व्यक्ति समय पर अस्पताल पहुंच सके । लेकिन बकोड़ा के ग्रामीणों के लिए ये सुविधाएं आज भी दूर की बात हैं ।सड़क की सर्वे हुई लेकिन , धरातल पर इंतजार
ग्राम प्रधान के मुताबिक मंच से बकोड़ा और सीम से बकोड़ा सड़क के लिए सर्वे किया जा चुका है । ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सर्वे के बाद सड़क निर्माण का रास्ता खुलेगा , लेकिन धरातल पर स्थिति अभी भी जस की तस बनी हुई है । ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर सर्वे से सड़क तक का सफर कब पूरा होगा ?PMGSY ने भेजी DPR , अब केंद्र की मंजूरी का इंतजार
इस मामले में PMGSY अधिकारी वीरेंद्र सिंह बोहरा का कहना है कि विभाग की ओर से सड़क को लेकर सभी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं । सड़क की DPR (Detailed Project Report) तैयार कर भारत सरकार को भेज दी गई है । वीरेंद्र बोहरा के मुताबिक जैसे ही भारत सरकार से सड़क निर्माण को मंजूरी मिलेगी , उसके बाद टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी ।
यानी फिलहाल बकोड़ा के ग्रामीणों के सामने फिर वही सवाल है - मंजूरी कब मिलेगी और सड़क आखिर कब बनेगी ?एक घायल किसान की तस्वीर , लेकिन सवाल पूरे गांव का
डंडे में बंधे घायल किसान की तस्वीर महज एक व्यक्ति की मजबूरी नहीं है । यह तस्वीर उस पूरे गांव की पीड़ा दिखाती है , जहां सड़क के अभाव में हर आपात स्थिति एक चुनौती बन जाती है । आज अगर किसी गर्भवती महिला , बुजुर्ग , बच्चे या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को तत्काल अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़े तो क्या होगा ? क्या हर बार ग्रामीण इसी तरह किसी मरीज को डंडे या डोली में बांधकर सड़क तक ले जाने को मजबूर रहेंगे ? बकोड़ा के ग्रामीणों की यह तस्वीर विकास की रफ्तार पर नहीं , बल्कि विकास की पहुंच पर सवाल उठा रही है ।ग्रामीणों की गुहार - सर्वे नहीं , अब सड़क चाहिए
ग्रामीणों की समस्या का समाधान कागजों पर सर्वे और DPR भेजने से नहीं होगा । उन्हें अब सड़क की स्वीकृति और निर्माण का इंतजार है । आजादी के 80 साल बाद भी अगर किसी गांव का घायल किसान 8 किलोमीटर तक डंडे में बांधकर सड़क तक पहुंचाया जा रहा है , तो यह तस्वीर सिर्फ बकोड़ा की नहीं , बल्कि पहाड़ के उन तमाम गांवों की पीड़ा है जो सड़क के इंतजार में विकास की मुख्यधारा से दूर खड़े हैं ।
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