कागजों में खत्म हुआ देवीधुरा मेला , जमीन पर नहीं ! समापन के दिन भी दुकानों पर उमड़ी भीड़
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
चम्पावत से सूरज लडवाल की रिपोर्ट
देवीधुरा बग्वाल मेले का औपचारिक समापन , लेकिन श्रद्धालुओं का जोश बरकरार ! शाम ढलते ही बाजार में फिर उमड़ी भीड़ ।
चम्पावत ( Champawat ) - मां वाराही धाम देवीधुरा में 23 अगस्त से शुरू हुआ ऐतिहासिक बग्वाल मेला 4 सितंबर को औपचारिक रूप से संपन्न हो गया । मेले के दौरान आस्था , परंपरा , संस्कृति और व्यापार का अनूठा संगम देखने को मिला । खास बात यह रही कि 28 अगस्त को चार खाम और सात थोक के लोगों तथा श्रद्धालुओं ने सदियों पुरानी बग्वाल परंपरा का विधिवत निर्वहन किया , लेकिन मेले की रौनक इसके बाद भी कम नहीं हुई ।चार खाम-सात थोक की बग्वाल बनी मेले का सबसे बड़ा आकर्षण
देवीधुरा की बग्वाल केवल एक आयोजन नहीं , बल्कि यहां की लोक आस्था , परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है । 28 अगस्त को चार खाम और सात थोक के लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां वाराही धाम पहुंचे और बग्वाल परंपरा का निर्वहन किया । बग्वाल के दौरान देवीधुरा का माहौल पूरी तरह भक्तिमय और उत्सवमय नजर आया । दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां वाराही के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की ।4 सितंबर को मेला खत्म हुआ , लेकिन लोगों ने मानने से कर दिया इनकार
चार सितंबर को मेले का औपचारिक समापन जरूर हो गया , लेकिन शाम होते-होते देवीधुरा का बाजार यह संदेश देता नजर आया कि लोगों का मन अभी मेले से भरा नहीं है । मेले के अंतिम दिन शाम को भी श्रद्धालुओं और खरीदारों की अच्छी-खासी भीड़ दुकानों पर जमी रही । कोई घर लौटने से पहले खरीदारी में जुटा था तो कोई मेले की यादों को अपने साथ समेटने में लगा था । यानी कागजों में मेला भले ही समाप्त हो गया , लेकिन देवीधुरा की शाम में मेले की रौनक अब भी जिंदा नजर आई ।दुकानों पर देर तक जारी रही खरीदारी , व्यापारियों के चेहरों पर दिखी रौनक
बग्वाल मेला केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं , बल्कि स्थानीय कारोबारियों के लिए भी बड़ा अवसर लेकर आता है । मेले में विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे व्यापारियों ने दुकानें सजाईं । कपड़े , घरेलू सामान , खिलौने , खान-पान और अन्य वस्तुओं की दुकानों पर लोगों की आवाजाही बनी रही । 4 सितंबर की शाम भी जब मेले के औपचारिक समापन की घोषणा हो चुकी थी , तब भी खरीदारी का सिलसिला थमता नजर नहीं आया । इससे साफ है कि देवीधुरा का मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था और छोटे व्यापारियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है ।आस्था के साथ यादों की पोटली लेकर लौटे श्रद्धालु
मेले में पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए यह सिर्फ खरीदारी और मनोरंजन का अवसर नहीं था । मां वाराही धाम में दर्शन , बग्वाल की परंपरा और देवीधुरा की धार्मिक मान्यताओं ने इस पूरे आयोजन को आस्था से जोड़ दिया । कई श्रद्धालु मां वाराही का आशीर्वाद लेकर अपने घरों को लौटे , तो कई लोग मेले की आखिरी शाम तक बाजार की रौनक का आनंद लेते दिखाई दिए ।औपचारिक समापन के बाद भी क्यों याद रहेगा देवीधुरा का मेला ?
23 अगस्त से 4 सितंबर तक चले इस मेले ने एक बार फिर साबित किया कि देवीधुरा का बग्वाल मेला सिर्फ कैलेंडर की तारीखों तक सीमित आयोजन नहीं है । यह चम्पावत की धार्मिक आस्था , लोक संस्कृति , परंपरा और स्थानीय व्यापार का बड़ा केंद्र है । 28 अगस्त की बग्वाल ने जहां सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत किया , वहीं 4 सितंबर की शाम बाजार में जमी भीड़ ने बता दिया कि मेले का औपचारिक समापन हो सकता है , लेकिन लोगों के उत्साह और यादों का समापन इतनी आसानी से नहीं होता । देवीधुरा की गलियों में देर शाम तक दिखाई देती चहल - पहल मानो यही कह रही थी -
मेला खत्म हुआ है, मेले की यादें नहीं ।
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