शिक्षक दिवस विशेष : सुगम - दुर्गम की दौड़ से दूर एक शिक्षक की ऐसी कहानी , जो पहाड़ की कठिन राहों पर शिक्षा की मशाल जला रही है
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
पिथौरागढ़ ( Pithoragarh ) - अधिकांश शिक्षक आजकल सुगम और दुर्गम की दौड़ में बेहतर तैनाती की तलाश में रहते हैं , लेकिन पहाड़ की दुर्गम वादियों में कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं , जिनके लिए नौकरी महज नौकरी नहीं बल्कि सेवा , संकल्प और जिम्मेदारी है । शिक्षक दिवस पर ऐसी ही प्रेरणादायी कहानी सामने आती है मुनस्यारी के शिक्षक भगवान सिंह की , जिन्होंने करीब 29 वर्षों से कठिन परिस्थितियों के बीच बच्चों को शिक्षा देने का बीड़ा उठाया है ।1997 से शुरू हुआ सफर , आज भी उसी जुनून के साथ जारी
भगवान सिंह ने सितंबर 1997 में प्राथमिक विद्यालय नामिक से अपनी सेवाएं शुरू की थीं । इसके बाद वर्ष 2008 से 2011 तक जूनियर हाईस्कूल और वर्ष 2011 से अब तक राजकीय हाईस्कूल नामिक में सेवाएं दे रहे हैं । यह वही नामिक क्षेत्र है , जहां शिक्षक के लिए विद्यालय तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं । पिछले साल स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें करीब 28 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी पड़ी थी । इसके बावजूद उनके कदम कभी शिक्षा की राह से पीछे नहीं हटे ।बैंक का काम हो या विभागीय बैठक... तीन दिन का सफर
दुर्गम क्षेत्र में तैनाती की मुश्किलों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बैंक से वेतन निकालने या विभागीय बैठकों में शामिल होने के लिए आने-जाने में ही करीब तीन दिन लग जाते हैं । जहां सामान्य परिस्थितियों में शिक्षक की रोजमर्रा की जिम्मेदारियां आसान हो सकती हैं , वहीं भगवान सिंह के लिए हर प्रशासनिक काम भी समय और श्रम की बड़ी कीमत मांगता है । लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके हौसले को नहीं तोड़ा ।गणित-विज्ञान के शिक्षक नहीं , फिर भी दोनों विषय पढ़ाते हैं
भगवान सिंह की कहानी को खास बनाता है उनका समर्पण । हाईस्कूल में गणित और विज्ञान के शिक्षक नहीं होने के बावजूद वह स्वयं इन दोनों विषयों को पढ़ा रहे हैं । यानी जिस कमी को व्यवस्था की मजबूरी समझकर छोड़ा जा सकता था , उसे उन्होंने अपनी जिम्मेदारी मानकर पूरा किया ।मुश्किल हालात में भी स्कूल का शानदार परिणाम
भगवान सिंह के समर्पण का असर विद्यालय के परिणामों में भी दिखाई देता है । सीमित सुविधाओं और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद स्कूल का परिणाम हमेशा शानदार रहा है । बेहतर शिक्षण के जरिए वह अपने विद्यार्थियों के सामने लगातार मिसाल कायम कर रहे हैं । उनके लिए शिक्षक होने का अर्थ सिर्फ कक्षा में पढ़ाना नहीं , बल्कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर परिस्थिति में खड़े रहना है ।सुगम पोस्टिंग की चाह से अलग है शिक्षक की कहानी
आज जब सुगम तैनाती के लिए शिक्षक अपनी पसंदीदा जगह पाने की कोशिश करते हैं , भगवान सिंह जैमियाल जैसे शिक्षक यह याद दिलाते हैं कि दुर्गम पहाड़ों में शिक्षा की लौ जलाए रखना भी किसी मिशन से कम नहीं । उनकी करीब तीन दशक लंबी सेवा उन बच्चों के नाम है , जिनके लिए स्कूल तक पहुंचना भी आसान नहीं । वह खुद 28 किलोमीटर की कठिन राह तय करके विद्यालय पहुंचते हैं , ताकि उनके विद्यार्थी ज्ञान की राह पर आगे बढ़ सकें ।शिक्षक दिवस पर असली सलाम ऐसे शिक्षकों को
शिक्षक दिवस पर जब हम गुरु के सम्मान की बात करते हैं , तब भगवान सिंह जैसे शिक्षक उस सम्मान के वास्तविक हकदार नजर आते हैं । पहाड़ की कठिन चढ़ाई , सीमित सुविधाएं और लंबी दूरी भी उनके संकल्प को नहीं डिगा सकी । क्योंकि कुछ शिक्षक सुगम रास्ते तलाशते हैं...और कुछ शिक्षक खुद दुर्गम रास्तों को पार करके दूसरों के लिए भविष्य की राह आसान करते हैं । उत्तराखंड हिंदी समाचार शिक्षक दिवस पर शिक्षक भगवान सिंह व उत्तराखंड के अन्य कर्मठ शिक्षकों को शत-शत नमन करता है ।
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