ऐसे भी शिक्षक : शिक्षक दिवस पर स्कूल पहुंचा पूरा गांव , लेकिन शिक्षक ही गायब ! एक शिक्षिका निलंबित , प्रधानाध्यापक पर भी कार्रवाई की तलवार
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
चमोली ( Chamoli ) -शिक्षक दिवस... यानी वह दिन जब बच्चे अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान जताते हैं , स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं और गुरु-शिष्य के रिश्ते की मिसालें दी जाती हैं । लेकिन चमोली के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक दिवस पर तस्वीर ही उलट नजर आई । बच्चे स्कूल पहुंचे , पर शिक्षक ही स्कूल से गायब मिले । मामला ज्योर्तिमठ विकासखंड के राजकीय जूनियर हाईस्कूल भलागांव का है , जहां विद्यालय में महज दो शिक्षक तैनात हैं । पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर दोनों शिक्षक विद्यालय में अनुपस्थित पाए गए । नतीजा यह रहा कि विद्यालय की शिक्षण व्यवस्था ही ठप हो गई ।बच्चे और परिजन पहुंचे , लेकिन गुरुजी-मैडम का पता नहीं
शिक्षक दिवस पर बच्चों को उम्मीद थी कि स्कूल में विशेष कार्यक्रम होगा , शिक्षक उन्हें पढ़ाएंगे और दिन कुछ अलग अंदाज में बीतेगा । बच्चे स्कूल पहुंचे तो उनके साथ उनके परिजन भी विद्यालय पहुंचे , लेकिन वहां न शिक्षक मिले और न ही पढ़ाई की व्यवस्था । सरकारी स्कूल में शिक्षकों की ऐसी गैरहाजिरी ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं ।शिक्षिका रेनू डंगवाल निलंबित
मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने भी इसे गंभीरता से लिया । जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक पंकज उप्रेती के अनुसार , विद्यालय में अनुपस्थित पाए जाने पर शिक्षिका रेनू डंगवाल के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया है । यानी शिक्षक दिवस पर स्कूल से गैरहाजिरी शिक्षिका को भारी पड़ गई ।प्रभारी प्रधानाध्यापक भी सवालों के घेरे में
वहीं , विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक देवेंद्र लाल के मामले में विभाग को जानकारी मिली है कि वह जनगणना ड्यूटी पर गए थे । लेकिन विभाग अब इस दावे की भी जांच कर रहा है । शिक्षा विभाग ने तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी है , ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देवेंद्र लाल वास्तव में जनगणना ड्यूटी पर गए थे या नहीं और यदि गए थे तो उन्होंने ड्यूटी की थी अथवा नहीं । रिपोर्ट आने के बाद ही प्रभारी प्रधानाध्यापक के खिलाफ आगे की कार्रवाई तय होगी ।सवाल सिर्फ गैरहाजिरी का नहीं , बच्चों के भविष्य का है
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकारी स्कूल पहले ही घटती छात्रसंख्या , पलायन और लगातार बंद होते स्कूलों की चुनौती से जूझ रहे हैं । ऐसे में जब बच्चे और उनके अभिभावक स्कूल पर भरोसा करके पहुंचें और वहां शिक्षक ही मौजूद न हों , तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी स्कूलों पर अभिभावकों का भरोसा कैसे कायम रहेगा ? स्कूल में बच्चों की संख्या घटने के पीछे केवल निजी स्कूलों की चमक या अभिभावकों की पसंद को जिम्मेदार ठहराना आसान है । लेकिन जहां शिक्षा की बुनियादी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाए , वहां जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है ।क्या ऐसी लापरवाही से बच पाएंगे पहाड़ के सरकारी स्कूल ?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी स्कूल सिर्फ पढ़ाई के केंद्र नहीं , बल्कि गांवों की सामाजिक व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं । कई जगह छात्रसंख्या कम होने के कारण स्कूल बंद होने की कगार पर हैं । ऐसे हालात में शिक्षकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है । अगर स्कूल में शिक्षक ही नहीं होंगे तो अभिभावक अपने बच्चों को वहां क्यों भेजेंगे ? यह सवाल सिर्फ भलागांव का नहीं है । यह सवाल उन तमाम सरकारी स्कूलों के सामने खड़ा है , जहां सरकार संसाधन उपलब्ध करा रही है , लेकिन व्यवस्था की सफलता आखिरकार शिक्षक की मौजूदगी , जिम्मेदारी और जवाबदेही पर ही निर्भर करती है ।शिक्षक दिवस पर मिली सीख - सिर्फ बच्चों को नहीं , व्यवस्था को भी
शिक्षक दिवस पर जहां देशभर में शिक्षक सम्मानित हो रहे थे , वहीं भलागांव की घटना ने शिक्षा व्यवस्था को ही आईना दिखा दिया । विभाग ने एक शिक्षिका को निलंबित कर दिया है और प्रभारी प्रधानाध्यापक के मामले में जांच शुरू हो चुकी है । अब देखना यह होगा कि जांच सिर्फ कार्रवाई तक सीमित रहती है या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था भी सामने आती है । क्योंकि आखिर सवाल एक ही है - जब बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं , तो शिक्षक स्कूल क्यों नहीं पहुंच रहे ? और अगर यही सिलसिला चलता रहा तो पहाड़ के सरकारी स्कूलों में बचेगा क्या ?
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