बड़ी खबर : उत्तराखंड में पशुपालन पर संकट ! पशुपालकों ने CM धामी से उठाई बड़ी मांगें , बोले- ठोस कदम नहीं उठे तो पहाड़ों से खत्म हो जाएगा पशुपालन
(Report - uttarakhandhindisamachar.com)
चम्पावत ( Champawat ) - जिले के देवीधुरा क्षेत्र के पशुपालक राजेश बिष्ट ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार कमजोर हो रहे पशुपालन व्यवसाय को लेकर जिलाधिकारी चम्पावत के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को गंभीर मांगों वाला पत्र ईमेल के माध्यम से भेजा है । पत्र में दूध के उचित मूल्य , वन्यजीवों से पशुधन की सुरक्षा , चारे की उपलब्धता , पशु चिकित्सा व्यवस्था और पशु बीमा सहित कई मुद्दों पर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है ।पशुपालन को बताया ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़
मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में कहा गया है कि पशुपालन पर्वतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला है , लेकिन वर्तमान में यह व्यवसाय गंभीर संकट से गुजर रहा है । पत्र के अनुसार , समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो पहाड़ों से पशुपालन के पूरी तरह खत्म होने का खतरा पैदा हो सकता है और रिवर्स पलायन का सपना प्रभावित हो सकता है ।हिमाचल से तुलना , दूध के दाम बढ़ाने की मांग
पत्र में हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए दावा किया गया है कि वहां पशुपालकों को दूध का बेहतर समर्थन मूल्य मिल रहा है । इसके विपरीत उत्तराखंड के पशुपालकों को आंचल डेयरी और निजी ऑपरेटरों को कम कीमत पर दूध बेचने की मजबूरी होने की बात कही गई है । पशुपालकों ने सरकार से गाय के दूध का न्यूनतम मूल्य ₹60 और भैंस के दूध का ₹70 प्रति लीटर निर्धारित करने तथा FAT/SNF के आधार पर पारदर्शी मूल्य निर्धारण की मांग की है ।वन्यजीवों का बढ़ता खतरा भी बना बड़ी चिंता
पत्र में बाघ , तेंदुए , भालू और जंगली सूअरों से पशुधन को होने वाले नुकसान का मुद्दा भी उठाया गया है । दावा किया गया है कि वन्यजीवों के हमलों से पशुपालन ग्रामीणों के लिए जोखिम भरा व्यवसाय बनता जा रहा है । पशुहानि के बाद मुआवजा प्रक्रिया को सरल करने और 72 घंटे के भीतर DBT के माध्यम से मुआवजा देने की मांग की गई है ।चारे के संकट से बढ़ी परेशानी
पशुपालकों ने पहाड़ी क्षेत्रों में हरे चारे की कमी और पशु आहार की बढ़ती कीमतों को भी प्रमुख समस्या बताया है । पत्र में कहा गया है कि चारे की व्यवस्था के लिए ग्रामीणों को कई बार जोखिमपूर्ण इलाकों और जंगलों का रुख करना पड़ता है । इसी को देखते हुए मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना को धरातल पर प्रभावी तरीके से लागू करने की मांग की गई है ।पशु अस्पतालों में डॉक्टर और दवाओं की मांग
पत्र में पर्वतीय क्षेत्रों की पशु चिकित्सा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं । पशुपालकों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशु अस्पतालों में पर्याप्त दवाएं , टीके और चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध नहीं होने से आपात स्थिति में परेशानी बढ़ जाती है । उन्होंने पशु चिकित्सालयों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और आवश्यक दवाओं का पर्याप्त स्टॉक रखने की मांग की है ।पशुपालकों ने सरकार के सामने रखीं 6 बड़ी मांगें
पत्र में प्रमुख रूप से दूध के लिए MSP/न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने , वन्यजीव हमलों में पशुहानि का 72 घंटे के भीतर मुआवजा देने , हर न्याय पंचायत स्तर पर साइलेज , चारा और पशु आहार उपलब्ध कराने , सीमांत पशुपालकों के पशुओं का 100 प्रतिशत सरकारी प्रीमियम पर पशुधन बीमा कराने । पर्वतीय पशु चिकित्सालयों में डॉक्टरों की उपलब्धता और दवाओं का स्टॉक सुनिश्चित करने की मांग की है । मांगें पूरी न होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त एवं त्वरित कार्रवाई करने की मांग की गई है ।पशुपालन बचाने के लिए तत्काल नीति की मांग
पशुपालकों का कहना है कि पहाड़ों में पशुपालन केवल आजीविका नहीं , बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार से जुड़ा विषय है । ऐसे में दूध के उचित दाम , चारे की व्यवस्था , वन्यजीवों से सुरक्षा और बेहतर पशु चिकित्सा सुविधाओं को लेकर सरकार को तत्काल ठोस नीति बनाने की जरूरत है ।
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